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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2114

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सर्वाभिमतभावोत्थं निर्विघ्नं स्वःसुखामृतम् ।

सेव्यमाना न बुद्धयंते गतं जन्म दिवौकस: ।।2114।।

स्वर्गसुख में सारा समय गुजर छाने का अबोधन―वे स्वर्गवासी देव अपने समस्त मनोवांछित पदार्थों से उत्पन्न बाधारहित ऐसे अद्भुत सुखामृत का सेवन करते हुए व्यतीत हुए समय को नहीं जानते । सुख के दिन जल्दी व्यतीत हो जाते हैं, उसका कारण यह है कि सुखों में इतनी अधिक आसक्ति हो जाती है कि वह समय जाना नहीं जाता । कहीं ऐसा नहीं है कि सुख के दिन छोटे होते हों और दुःख के दिन बड़े । दुःख के दिन तो काटे नहीं कटते हैं, दुःख तो किसी को भी इष्ट नहीं । इसी से दुःख का समय अधिक लंबा मासूम पड़ता है । तो सागरों पर्यंत की आयु है स्वर्गों में । 22 सागर की आयु सोलहवें स्वर्ग में देवों की बतायी है । 1 सागर कितना बड़ा होता है? कल्पना करो कि दो हजार कोश का लंबा, चौड़ा, गहरा कोई गड्ढा है और उसमें बालों के छोटे-छोटे टुकड़े, जिनका दूसरा हिस्सा न हो सके, सो भी बहुत कोमल पतले बालों के टुकड़े ठसाठस भर दिये जाये, उस पर सैकड़ों हाथी फेर दिये जायें, फिर प्रत्येक 100 वर्ष में एक बाल का टुकड़ा निकाला जाय तो सारे बाल-खंड निकालने में कितने वर्ष लगेंगे?.. .जितने वर्ष लगें उतने का नाम है व्यवहारपल्य और उससे अनगिनते गुणे वर्षों का नाम है उद्धारपल्य और उससे अनगिनते गुणे वर्षों का नाम है अद्धापल्य । एक करोड़ अद्धापल्य में 1 करोड़ अद्धापल्य का गुणा करें, उसका नाम है एक कोड़ाकोड़ी अद्धापल्य । ऐसे 10 कोड़ाकोड़ी अद्धापल्य का 1 सागर होता है, ऐसे-ऐसे 22 सागर की भी उस सुख भोगते-भोगते में गुजर जाती है, पता नहीं पड़ता । जब मरण का समय आता है तो सोच होता है कि अब तो मेरा मरने का वक्त आ गया है ।

सांसारिक सुखमग्नता से महती विपन्नता―भैया ! सुख में मग्न होना भी बहुत बड़ी विपदा है । मोही जन तो इन सुखों में आसक्त हो जाते है, ज्ञान और वैराग्य का बल लगाने का वे प्रयत्न नहीं करते । ये इष्ट समागम मिले हैं तो सोचना चाहिए कि ये कभी बिछुड़ेंगे । यदि यह विचार आ गया तो इष्ट समागम में आसक्ति नहीं होती । और फिर इष्ट समागम क्या है? कोई क्या कर देगा अपने में? कैसा ही प्रिय हो, कैसा ही मित्र हो, कैसा ही आज्ञाकारी हो, कर क्या देगा? वह अपने में अपना ही परिणाम करेगा । दूसरा अपने में अपनी ही कषाय शांत करेगा । प्रभु का ध्यान कर के प्रभु से यही मांगें कि हे नाथ ! यह सांसारिक सुख में मग्न होने की विडंबना विपदा मेरे पर न आये, मैं उस सुख में ही सुखी हूँ, मैं उस दुःख में ही आनंद मानूंगा जिस दुख में रहकर हे प्रभो ! तेरी याद तो आती रहे । अपने आपके उस परमात्मस्वरूप की सुध तो आती रहे तो दुःख भी मुझे मंजूर है ।

कष्टसहिष्प्गुता का गुण―ये सांसारिक सुख कर्मों के अधीन हैं, उदय ठीक है तो सुख मिलेंगे, जिन सुखों का अंत होता है, जिन सुखों के बीच में अनेक दुःख भरे पड़े हुए हैं, जो सुख पाप के बीज हैं ऐसे सुखों का राग न हो । भैया! विनती करें प्रभु से और अपने चित्त में ऐसी सहनशीलता उत्पन्न करें कि जो कोई दुःख की स्थिति आये तो उन सब दुःखों को सहन करने में समर्थ हों, जो दुःख ऐसे हैं कि मेरे शरीर पर कोई प्रयोग न कर सके, बाहर-बाहर की ही बातें हैं, उन दुःखों को सहन करने में कौनसी कठिनाई है? धन कम हो गया, कोई रूठ गया, किसी इष्ट का समागम नहीं हो सक रहा, किसी इष्ट का वियोग हो गया तो ये तो बाहर ही बाहर की होने वाली बातें हैं । शरीर पर मार तो नहीं पड़ रही । ऐसे दुःखों को सहन करने में कौनसी कठिनाई आ रही है? अगर कुगति आ गयी तो उसका फल कौन भोगेगा? खुद को ही तो भोगना पड़ेगा । सो ऐसे सुखों के दिन स्वर्ग वासियों के ऐसे व्यतीत हो जाते कि वे जाने नहीं जाते ।

(धर्म्यध्यानफलवर्णन प्रकरण 41)


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