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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2132

From जैनकोष



अवीचारो वितर्कस्य तत्रैक्त्वेन संस्थित: ।

सवितर्कमवीचारं तदेकत्वं विदुर्बुधा: ।।2132।।

एकत्ववितर्क अविचार का शाब्दिक लक्षण―जिस ध्यान में विचार नहीं होता, जो एकरूप से रहता है, जिस तत्व को ध्यान में लिया है, जिस योग में रहकर वह ध्यान जमाया है, न तो तत्व बदले, न योग बदले, इस प्रकार अर्थ के न बदलने से, योग के न बदलने से तथा जिन अंतर्जल्पों से जो कि अत्यंत सूक्ष्म हैं, ध्यान किया जा रहा है, उन शब्दों के भी न बदलने से ऐसे एक भाव को लिए हुए ध्यान होने को एकत्ववितर्कअवीचार शुक्लध्यान कहते हैं । इस ध्यान में ऐसी सामर्थ्य है कि इसके बाद नियम से केवलज्ञान उत्पन्न होता है । यों शुक्लध्यान के वर्णन में दो शुक्लध्यानों का स्वरूप कहा है, अब शेष आगे कहेंगे ।


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