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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2134-2135

From जैनकोष



अर्थादर्थांतरापत्तिरर्थसंक्रांतिरिष्यते ।

ज्ञेया व्यंजनसंक्रांतिर्व्यंजनाद्यंजने स्थिति: ।।2134।।

स्यादियं योगसक्रांतिर्योगाद्योगांतो गति: ।

विशुद्ध यानसामर्थ्यात्क्षीणमोहस्य योगिन: ।।2135।।

संक्रांतियाँ और वर्तमानपद में अपना कर्तव्य―जिन योगियों ने अपने ज्ञानध्यान का विषयमात्र परमपावन ज्ञानस्वभाव ही बनाया है उनका आत्मा कितना पवित्र है और उन पवित्र आत्मावों की जो उपासना में रहते हैं वे भक्त जन भी पवित्र हो जाते हैं । ऐसे ये योगीश्वर पृथक्त्ववितर्कवीचार शुक्लध्यान में चलते हैं, एक पदार्थ से बदलकर दूसरे पदार्थ का ज्ञान करने लगते हैं । करें ज्ञान । अब ये इतने कुशल हैं इतने अपने ब्रह्मस्वरूप के निवासी हैं कि कितना भी ज्ञान बदलता रहे, पर परिणामों में विचलितता नहीं हो सकती । यह बात शुक्लध्यान की है । हम आप लोगों को तो यत्न कर करके बाह्य पदार्थो से हट-हटकर एक विशुद्ध ध्रुव निज ज्ञानस्वभाव की उपासना का यत्न करना चाहिए, क्योंकि हम आपकी बुद्धि व्यभिचारिणी है यों कहो, अर्थात् यह बुद्धि कभी कहीं लगती, कभी कहीं । किसी एक पदार्थ में स्थिरता से यह बुद्धि नहीं ठहरती । तो इस बुद्धि को संयत करने का उपदेश दिया गया है कि तुम सर्व ओर से बुद्धि हटाकर एक निज तत्व में ही लगावो, लेकिन जो निज तत्व की उपासना से ब्रह्मस्वरूप का स्वसम्वेदन चिंतन करता है ऐसे पुरुष के ज्ञान में कुछ भी पदार्थ आयें, वे सब उनकी शुक्लता को ही रखते हैं । तो वहाँ एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ का बदलना होता है यह तो है अर्थ संक्रांति । किन्हीं शब्दों से ध्यान कर रहे थे, अब बदलकर किन्हीं शब्दों से ध्यान करने लगे हैं, यह है व्यंजनसंक्रांति, और मनोयोगी बनकर ध्यान कर रहे थे―यह वचनयोगी बन गया अथवा काययोगी बन गया, इस प्रकार योगों का परिवर्तन होता है, यह है योगसक्रांति । इस विशुद्ध ध्यान की सामर्थ्य से जब मोह क्षीण हो जाता है तब उस योग की यह अदल-बदल भी समाप्त होती है और उसके बाद थोड़े ही समय में केवलज्ञान का उदय हो जाता है ।

अंतर्जल्प की गहराई―देखिये―हम कितना ही मौन रख लें तिस पर भी भीतर में अनेक प्रकार की गुत्थियाँ चलती रहती हैं, और वे जो कुछ भी विचार चलते हैं वे पूरे वाक्य बोल बोलकर चल रहे हैं, फिर थोड़ासा एक मन पर काबू होता है, अपने अंतर्वचनों पर संयम होता है तो इतना बड़ा सेन्टेन्स तो चाहे न बोला जाय एक कल्पना में जैसे कि किसी चीज के प्रोग्राम चलते हैं, फिर भी कुछ भी ज्ञान होता है तो उस ज्ञान के साथ वे शब्द बीधे-बीधे फिरते हैं । जैसे आँखें खोलकर देखा कि यह भींत है तो भीतर में यह भीत है―इन शब्दों का उदय हो जाता है । तो इस प्रकार उस श्रेणी की स्थिति में भी, जिसकी हम अपने अंतर्जल्पो से तुलना तो नहीं दे सकते, इतना तो बहुत गड़बड़ अंतर्जल्प है, एक विराटरूप को लिए हुए है, किंतु उनका वह सूक्ष्म ज्ञान, सूक्ष्म ध्यान वह भी कुछ न कुछ अंतर्जल्प अथवा सूक्ष्म कुछ भी वचनों की परंपरा को लिए हुए चलता है । कुछ समय तक उस श्रेणी में रहने वाले योगीश्वरों का ध्यान भी वचनों को बदल-बदलकर चलता रहता है । किंतु वहाँ ध्यान की संतति रहा करती है, अतएव वह ध्यान एक ध्यान है, क्योंकि एक ध्यान में अनेक ज्ञान चलते रहते हैं ।


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