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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2138

From जैनकोष



त्रियोगी पूर्वविद्य: स्यादिदं ध्यायत्यसौ मुनि: ।

सवितर्कं सवीचारं सपृथक्त्वमतो मतम् ।।2138।।

सहजतत्त्व के दर्शन में सहजभाव की सहजसिद्धि―जिसके तीनों योग होते हैं, जो पूर्व का जाननहार है ऐसे ज्ञानी के पहिले शुक्लध्यान होता है, तभी से योग बदलेंगे । अगर एक एकत्व में ही शुक्लध्यान हो तो उसके बदलने का कोई कारण नहीं है, फिर तो द्वितीय शुक्लध्यान की स्थिति होगी, जिसके बाद नियम से केवलज्ञान होगा । आज कोई लोग सोचते होंगे कि विषय बड़ा कठिन है, क्या इतना कठिन विषय समझने का परिश्रम हम न करेंगे तो मुक्ति का रास्ता ही न मिलेगा? तो भाई यह सब कुछ जानने में तो कठिन चाहे लगे पर किए जाने में कठिन नहीं है । जो भी योगी हो, चाहे वह अष्टप्रवचन मातृका का ज्ञानी है, एक अपने निज परमात्मतत्व का ज्ञान होना तो अनिवार्य है । उसके बिना तो आगे गति चल नहीं सकती ।व्याकरण, छंद, ज्योतिष आदि अनेक पर्यायों का ज्ञान, अनेक शास्त्रों का ज्ञान ये चाहे न भी हो सकें, किंतु प्रयोजनभूत जो एक निज शुद्ध आत्मतत्त्व है, सहज स्वभाव है, उसका परिचय होना तो अनिवार्य है, उसकी उपासना के प्रताप से ये सब बातें होती हैं, जिसकी समझ बिना कठिन लग रहा है, और जिसका आलंबन करना भी कुछ कठिनसा मालुम होता है, ये सारी की सारी कठिन बातें उनके सहज हो जातीं हैं जो एक अपने विशुद्ध तत्व का निर्णय कर के बस उसकी ही शरण गह लेते हैं ।

आत्मनिधि की श्रद्धा में निराकुलता―श्रद्धा की बात है । जिसने अपने जीवन का कुछ लक्ष्य निर्णीत नहीं किया ऐसा पुरुष आकुलतावों में अपना जीवन व्यतीत करता है, और जिसका एक मात्र यही निर्णय है कि हम मनुष्य हुए हैं तो केवल इसलिए अपने सहजस्वरूप को जानें और उसके निकट अपना उपयोग बनाये रहे, क्योंकि जगत में कहीं मेरा कोई शरण नहीं है, मैं किससे स्नेह करूँ, यहाँ कौन मेरा रक्षक बन सकेगा? वस्तुस्वरूप ही ऐसा है ।तब फिर जो कुछ भी करना है वह अपने आपको ही करना पड़ेगा ऐसा समझकर जो अपना एक इसी प्रकार का लक्ष्य बनाता है उस व्यक्ति का जीवन आकुलतारहित व्यतीत होता है । बहुत बड़ी जिम्मेदारी है यह अपने आप पर । थोड़ा मानो संपदा काफी मिल गई, खाने पीने पहिनने ओढ़ने के कुछ साधन मिल गए, घर के लोग भी बड़े प्रेमी मिल गए तो इतने मात्र में संतुष्ट होकर जीवन गुजारने में कोई बुद्धिमानी नहीं है । बुद्धिमानी तो इसमें है कि अन्य बातों की परवाह न करें । कुछ भी आता है तो आये, जाता है तो जाये, उसमें क्या हर्ष विषाद करना? दशरथ महाराज के पुत्र श्री रामचंद्र जी समस्त पब्लिक के आँखों के तारे थे, जिन्हें राजगद्दी मिलनी थी, बड़े वैभव और ऐश्वर्य में जिनका जीवन था, वे क्षणमात्र में कहां से कहाँ गए, जंगल में । उनके साथ क्या था? कुछ भी स्थितियाँ आयें―महत्ता तो इस बात में है कि बाह्य में कुछ भी होता हो उसकी परवाह न करें और अपने आपमें बसा हुआ जो विशुद्ध परमात्मतत्व है उसकी उपासना करें ।

आत्मतत्वाश्रय के वैभव की महत्ता―यह आत्मतत्त्व जब अपने निकट है तो परवाह करने की क्या जरूरत? जब अपना आत्मतत्त्व अपनी दृष्टि में है, तो फिर बाहर का कोई भी उपद्रव क्या बिगाड़ कर सकेगा? उपद्रव तो मानते हैं ये संसारी अज्ञानी प्राणी । कुछ उदयवश संपदा ऐश्वर्य प्राप्त हो गयी तो उतनी सी ही बात पर ये अपने आत्महित के मार्ग को खो देते हैं तो इसमें कौनसी बुद्धिमानी है? मिलता है तो ठीक है, चक्रवर्ती के भी तो पुण्य का उदय है, बड़ी-बड़ी विभूतियां उनके समक्ष आती हैं । पर ज्ञानी चक्रवर्ती उन विभूतियों से भी उदास रहता है, ये भोग विषय के साधन तो दुःख के ही कारण हैं, इनमें क्या लुभाना? ऐसा वह ज्ञानी चक्रवर्ती समझता है । तो बहुत बड़ी जिम्मेदारी है अपने आप पर । अभी से ही जिसकी जो आयु हो, इसी समय से इस परमात्मतत्व के दर्शन करने की धुनि बनायें । उसकी ही उपासना से ज्ञानी और विरक्त रहकर अपना जीवन सफल करें । अनेक जन्म पाये, बड़ी-बड़ी विभूतियाँ प्राप्त की होंगी, पर आज उनका क्या रहा? उन सभी समागमों से आज इस जीव को मिल क्या रहा है? यों ही समझिये कि इस वर्तमान में भी हमें मिलना ही क्या है?

उदारता की प्रकृति से आत्मशृंगार―यह वैभव ठीक है, रहो, कमाना भी जरूरी है गृहस्थपद में, ठीक है कमावो, पर समय आये तो उससे विरक्त होने में देर न लगे । ऐसा ज्ञान तो बना रहे । एक जौहरी की लड़की किसी बड़े घी बेचने वाले सेठ के घर ब्याही गई । वह घी बेचने वाला भी धनी था और जौहरी भी धनी था । कुछ दिनों के बाद बहू ने एक दिन घी के कारखाने की ओर निगाह डाली तो देखा कि सेठ जी एक मक्खी उस घी की कड़ाही के ऊपर पकड़े हुए उसमें एक आध बूंद लगा हुआ घी गिरा रहे हैं, तो इस दृश्य को देखकर उस बहू का होश उड़ गया, हाय मैं कैसे कंजूस के घर आयी? कहते भी हैं लोग मक्खीचूस । उसका और अर्थ ही क्या है? सो उस बहू का सिर दर्द करने लगा । बीमार पड़ गई । सेठ के पास खबर पहुंची । आये सेठ जी और पूछा कि क्या तकलीफ है? बहू ने अपनी सिरदर्द की तकलीफ बतायी । आखिर उस सेठ ने कई डाक्टरों से दवा करवायी, बड़ा खर्च किया, पर उसका सिरदर्द न मिटा । मिटे कैसे? वह तो दूसरे ही प्रकार का दर्द था । आखिर सेठ पूछता है―कहो बहू―तुम्हारे यह दर्द कभी और भी हुआ या नहीं? तो बहू ने बताया कि हाँ कभी-कभी हो जाता था । तो वह मिटता कैसे था ? मोतियों को पीसकर उसका मस्तक पर लेप करने से । तो सेठ ने झट दस हजार रुपये देकर आध पाव मोतियाँ मंगायी और ज्यों ही उनको खुद ही पीसने चला तो बहू बोली―बस पिताजी आप इन्हें पीसे नहीं, मेरा सिरदर्द ठीक हो गया । ....अरे कैसे ठीक हो गया, जब इनका लेप लगावोगी तभी तो ठीक होगा । ....नहीं, ठीक हो गया ।...कैसे ठीक हो गया ?....पिताजी वह दर्द उस मक्खीचूस की घटना का था कि एक आध बूंद घी लगा होगा उस मक्खी में और आप उसे पकड़े हुए उस घी को टपका रहे थे । उस घटना को देखकर मैंने सोचा―ओह मैं कैसे कंजूस के घर ब्याही गई, उसका दर्द था, पर जब देखा कि आप मौका पड़ने पर हजारों रुपये खर्च करने को तैयार हैं तो हमारा वह दर्द मिट गया । तो वह सेठ कहता है―अरी बहू तू अभी जानती नहीं है―हमारा यह सिद्धांत है कि कमाये तो इस तरह कमाये और खर्च करें तो इस तरह खर्च करे । तो बहू ने कहा―हाँ पिताजी अब समझ गई । तो हम उस तरह से मक्खीचूस करके कमाने की बात नहीं कह रहे हैं । ठीक है कमाते हो तो कमाइये, गृहस्थपद में रहकर कमाना ही चाहिए, पर इतनी बात तो अवश्य होनी चाहिए कि मौका पड़ने पर उसे खूब खर्च करने की भावना रखें । उस कमाने के साथ ही यह तत्वज्ञान बनाये रहें कि ये सब चीजें हम से अत्यंत भिन्न हैं, कुछ आवश्यकताएँ हैं जिनके कारण हमें कमाने की प्रवृत्ति करनी पड़ती है, ये व्यवहार के सहायक भी हैं, पर वास्तव में ये सब मेरे आत्मा के हित में सहायक नहीं हैं । मेरा हित करने वाला तो मेरा आत्म-दर्शन है, अन्य किसी भी पदार्थ से मेरा हित नहीं है ।


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