• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2144

From जैनकोष



पृथक्त्वे तु यदा ध्यानी भवत्यमलमानस: ।

तदैकत्वस्य योग्य: स्यादाविर्भूंतात्मविक्रम: ।।2144।।

द्वितीय शुक्लध्यानी का आत्मविक्रम―जिस समय ध्यानी का चित्त इस पृथक्त्ववितर्कवीचार शुक्लध्यान के द्वारा कषायों से रहित होता है तब उस योगी में अद्धृत पराक्रम प्रकट होता है और वह द्वितीय शुक्लध्यान के योग्य होता है । अभी तो ज्ञान में बहुत अदल-बदल चल रहे हैं किंतु एकत्ववितर्कअवीचार ध्यान में ये सब अदल-बदल समाप्त होते हैं । जिस पदार्थ से जाना हे, जो ज्ञेय है उस ज्ञेय से बदलेगा नहीं और वह ज्ञान उत्पन्न हो जायगा ऐसा यह शुक्लध्यान का दूसरा चरण है ।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव_-_श्लोक_2144&oldid=83930"
Categories:
  • ज्ञानार्णव
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:33.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki