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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2153

From जैनकोष



तदा स भगवान् देव: सर्वज्ञ: सर्वदोदित: ।

अनंतसुखवीर्यादिभूते: स्यादग्रिमं पदम् ।।2153।।

अनंत आनंद और शक्ति का अग्रिम स्थान―जब केवलज्ञान की प्राप्ति होती है उससमय भगवान देव हैं, सर्वज्ञ हैं व सर्व काल में उदित हैं । वे नित्य उदित रहते हैं । सूर्य चंद्र तो रात दिन में अपने समय पर उदित होते हैं पर केवल ज्ञानरूप सूर्य प्रकाश पुंज प्रकट हो तो सदा के लिए उदित रहता है । प्रभु अनंत सुख वीर्य आदिक विभूतियों के प्रथम स्थान हैं । यह उनकी भावमुक्ति का व द्रव्यमुक्ति का स्वरूप है । भगवान क्या है, उसको हम ज्ञान दर्शन आनंद शक्ति इन चार गुणों के विकासरूप में निरखा करें । तो हम भगवान के स्वरूप को जान सकते हैं । रूप रंग आकार मुद्रा ये भगवान के स्वरूप नहीं हैं । जिस देह में विराजमान हैं प्रभु उस देह का यह वर्णन है । प्रभु को तो अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत आनंद और अनंत शक्ति में समझा जाता है । ज्ञान और दर्शन की बात तो प्रसिद्ध ही है, अनंत आनंद में यह महात्म्य है, वहाँ रंच भी आकुलता नहीं है । आकुलता के न होने को आनंद कहते हैं । और इस ही कारण जो एक सहज परम गंभीर आल्हाद रहता है वह आनंद का परिणमन है । अनतंशक्ति से वह अपने अनंत गुणों के विकास को बराबर बनाये रहता है । कोई गुण कभी थकता नहीं है विशुद्धपरिणमन से । ऐसे अनंत चतुष्टय संपन्न भगवान सयोगकेवली हो जाते हैं, तब क्या परिस्थितियाँ होती हैं?


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