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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2156

From जैनकोष



ज्ञानलक्ष्मीं तपोलक्ष्मीं लक्ष्मीं त्रिदशयोजिताम् ।

आत्यंतिकीं च संप्राप्य धर्मचक्राधिपो भवेत् ।।2156।।

धर्मचक्री लक्ष्मीपति―ये प्रभु ज्ञानलक्ष्मी, तपोलक्ष्मी और देवों के द्वारा नियोजित समवशरण आदिक लक्ष्मी, तथा मोक्ष लक्ष्मी को प्राप्त कर के धर्म के चक्रवर्ती होते हैं । प्रभु अरहंतदेव के है ज्ञानलक्ष्मी । वास्तविक लक्ष्मी तो ज्ञानलक्ष्मी को ही कहते हैं । लक्ष्मी का अर्थ है चिन्ह । आत्मा की लक्ष्मी अर्थात् आत्मा का चिह्न है ज्ञान । यह ज्ञानलक्ष्मी उपादेय है । यह ज्ञानलक्ष्मी सर्व जगत के प्राणियों का हित करने वाली है । कुछ समय तक तो इस ज्ञानलक्ष्मी को उपादेय माना जाता रहा, उसी की पूजा होती रही । पर कुछ समय बाद में ज्ञान की बात तो छूट गयी और संसारी जीवों ने अपने विषयसाधनों से ही अपना सब कुछ हित माना । तो इन विषयसाधनों में साधनभूत जो कल्पित लक्ष्मी मानी गई है उसकी उपासना में लग गये, पर यह विदित नहीं किया कि यह लक्ष्मी तो, यह धन वैभव तो पुण्य का उदय आने पर स्वत: आता है और पुण्य का उदय विलीन लेने पर यह विलीन हो जाता है । उपासना से, पूजा से वैभव नहीं आता है । यह तो अपने षट्कर्मों से, दया दान परोपकार के भाव से विशिष्ट पुण्य-संचय होता है, इसके उदय में ये सब प्राप्त होते हैं । प्राप्त हों, किंतु उससे आत्मा का उत्कर्ष नहीं है ।

बाह्य लक्ष्मी की क्लेशरूपता―एक सेठ करोड़पति था, पाप का उदय आने पर उसे अपनी सारी संपदा से हाथ धोना पड़ा । गुजारा चलाने के लिए उसे अरजीनवीसी का काम करना पड़ा । कुछ दिनों बाद वह सेठ अटारी से जीने की सीढ़ियों पर से उतर रहा था तो उसे कुछ शब्द सुनाई पड़े । वे शब्द थे―क्या मैं, आऊँ? सेठ ने―आकर वह वृत्तांत सेठानी को बताया । तो सेठानी ने कहा कि इस बार कहे तो उससे कह देना कि मत आवो । आखिर दुबारा जब कहा-क्या मैं आऊँ, तो उस सेठ ने कहा मत आवो । वह आवाज थी लक्ष्मी की ।यों जब कई बार उस लक्ष्मी ने कहा―क्या मैं आऊँ तो एक बार सेठ को कहा सेठानी ने कि अच्छा इस बार कह देना कि आवो तो सही पर आकर जाना नहीं । तो वह लक्ष्मी कहती है आऊँगी तो सही पर जब चाहे चली जाऊँगी । सेठ ने फिर सेठानी से सलाह भी, तो सेठानी ने कहा कि कुछ अनुरोध और करना, और मंजूर कर लेना । फिर अगले दिन बात हुई तो लक्ष्मी कहती है कि मैं सदा तो नहीं रह सकती, पर यह वचन देती हूँ कि जब जाऊँगी तो कहकर जाऊँगी ।अब देखिये क्या होता है? अगले दिन उस सेठ ने जो कि- गरीबी आ जाने के कारण अरजीनवीसी का काम कर रहा था, रानी की ओर से उसके कहीं बाहर गए हुए राजा को एक पत्र लिख दिया । राजा उस पत्र को लेकर आया और उस पत्र पर इतना खुश हुआ कि उस सेठ को अपना मंत्री बना लिया । अब क्या था? लक्ष्मी आने के उसके पास अनेक उपाय थे । यों कुछ ही दिनों में वह फिर बड़ा धनिक बन गया । एक दिन सोचा कि वह लक्ष्मी तो कहती थी कि आऊँगी तो सही, पर चली जाऊँगी, तो अब मैं देखूँगा कैसे वह लक्ष्मी जाती है? सो उसने अपना बहुतसा धन हंडो में भरकर ऊपर से तवा जलाकर जमीन में गड़वा दिया था ।सोचा कि अब तो हमारे पास से यह लक्ष्मी किसी तरह भी नहीं जा सकती । पर हुआ क्या कि एक दिन वह राजा अपने मंत्री इसी सेठ को लेकर जंगल गया बीड़ा करने के लिए । राजा की थकान मेटने के लिए उस मंत्री ने अपनी जाँघ पर सिर धरकर लिटा दिया । राजा के कमर में तलवार लटक रही थी । जब राजा को कुछ निद्रासी आने लगी तभी बह लक्ष्मी आयी और बोली कि अब तो मैं जाती हूँ, तो वह मंत्री कहता है कि मैं तुझे न जाने दूंगा, आखिर दुबारा कहा कि मैं जाती हूं तो उस मंत्रि ने तलवार निकालकर लक्ष्मी को मारने के लिए हाथ उठाया इतने में ही कुछ झटकासा लगने से बह राजा जग गया । देखा―ओह ! मंत्री के हाथ में तलवार ।सोचा कि इसने मुझे मारने की सोची होगी । खैर, वहाँ तो कुछ न बोला वह राजा, पर अपने दरबार आने पर पहरेदारों से कहा कि ऐ पहरेदारों इस मंत्री को सपरिवार हमारे राज्य से बाहर निकाल दो । वह मंत्री सपरिवार राज्य से बाहर निकल दिया गया । अब देखो उसका सारा धन उसके पास से जाता रहा । तो यह लक्ष्मी उसकी पूजा करने से, उसकी उपासना करने से नहीं प्राप्त होती है । अपने परिणाम अगर ठीक होगे तो उससे पुण्य का बंध होगा और यह लक्ष्मी प्राप्त होगी और यदि अपने परिणाम खोटे हैं तो उससे पाप का बंध होगा और उसे नरक में जाना पड़ेगा । तो वास्तव में लक्ष्मी तो ज्ञानलक्ष्मी कहलाती है । ये प्रभु इस ज्ञानलक्ष्मी को पाये हुए हैं । उनका आंतरिक तपश्चरण सदा आत्मा में रहता है । ये प्रभु अब अत्यंत विशुद्ध हो गए । देवताओं ने जो समवशरण लक्ष्मी की रचना की उसमें वे शोभित हो रहे हैं ।ऐसे ये प्रभु सर्वप्रकार की लक्ष्मी को पाकर धर्मचक्र के अधिपति होते हैं । ऐसी आदर्श अवस्था प्राप्त होती है, यह सब शुक्लध्यान का प्रसाद है ।


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