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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2169

From जैनकोष



काययोगे स्थितिं कृत्वा वादरेऽचिंत्यचेष्टित: ।

सूक्ष्मीकरोति वाक्चित्तयोगयुग्मं स वादरम् ।।2169।।

अचिन्यचेष्टित प्रभु के योगों का सूक्ष्मीकरण―देखिये―प्रभु के विहार का समय बहुत वर्षों तक भी चलता है, सो किसी प्रभु का विहार में बहुत समय व्यतीत हो गया । भगवान के दिव्य उपदेश से भी इन तीनों लोक के प्राणियों ने लाभ प्राप्त किया । अब सयोगकेवली के अंतिम अंतर्मुहूर्त की स्थिति बतायी जा रही है । समुद्धात किया और समुद्धात करने के बाद अब उनके लिए कम और कुछ नहीं पड़ा । काम तो पहिले भी न था, पर जैसे विहार होना, दिव्य उपदेश होना, ये कार्य होते थे, अब इनका भी समय न रहा । अब तो सयोगकेवली होकर शीघ्र ही निर्वाण प्राप्त करेंगे । भगवान अरहंत को 13 वें गुणस्थान में सयोगकेवली शब्द से पुकारा गया है । केवली तो हैं किंतु सयोगी हैं, योग सहित हैं । मनोयोग, वचनयोग, काययोग ये तीन प्रकार के योग अभी उनके चल रहे हैं, पर इस समय अब क्या होना चाहिए जिससे भगवान का उत्कर्ष बढ़े? तो योग मिटना चाहिए । अयोगकेवली बनना है तो भगवान के योग किस तरह दूर होते हैं, उसका अब यह वर्णन है । वह प्रभु अपने आपके अंतरंग में क्या किया करते हैं और बाहर में उनकी क्या प्रवृत्ति हो रही है, यह बता रहे हैं । उन भगवान के योगनिरोध की बात कही जा रही है ।

वादरवचनयोग व वादरमनोयोग का सूक्ष्मीकरण―वे प्रभु उस समय वादरकाययोग में स्थित होकर वचनयोग का निरोध करते हैं । इससे पहिले श्वासोच्छ्वास का निरोध होता है । प्रभु के वचनयोग, काययोग वचनबल कायबल आयु और श्वासोच्छ्वास―ये चार प्राण माने गए हैं । आयु का निरोध नहीं किया जाता । यहाँ मनोयोग की बात निरोध में आयगी सो निरोध की चीजें चार हैं―श्वासोच्छ्वास, वचनयोग, मनोयोग, काययोग । उनमें सबसे पहिले श्वासोच्छ्वास समाप्त हो जाता है । जब श्वासोच्छ्वास पूर्णरूप से रुद्ध हों जाता है तब योगों में से सबसे पहिले वादरवचनयोग को वे सूक्ष्म कर देते अर्थात् वादरवचनयोग नहीं रहता । अब सूक्ष्मवचनयोग रहा । इसके पश्चात् वादरमनोयोग को भी सूक्ष्म करते हैं । वादरमनोयोग भी नहीं रहा । शरीर के जो द्रव्य मन की रचना है उस मन के स्थानपर मनोवर्गणायें आती रहती हैं ।अब इस समय मनोवर्गणा का रुकाव हो गया, वादरमनोयोग नहीं रहा, अब सूक्ष्म मनोयोग रहा । इस प्रकार वादरवचनयोग और वादरमनोयोगों को भगवान ने सूक्ष्म कर दिया अर्थात् वादरमनोयोग नहीं रहा । सूक्ष्मवचनयोग और काययोग अभी बने हैं ।


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