• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2171

From जैनकोष



काययोगे तत: सूक्ष्मे स्थितिं कृत्वा पुन: क्षणात् ।

योगद्वयं निगृहणाति सद्यो वाक्चित्तसंज्ञकम् ।।2171।।

सूक्ष्मकाययोग में स्थित प्रभु के समस्त वचनयोग व मनोयोग का विनाश―अब वे भग-वान सूक्ष्मकाययोग में स्थिति कर के सूक्ष्मवचनयोग और सूक्ष्ममनोयोग को नष्ट कर देते हैं, इस समय वे भगवान केवल सूक्ष्म काययोग में रह गये । और वादरकाययोग सभी मनोयोग और सभी वचनयोग, ये दूर हो गये । इस समय प्रभु में सूक्ष्मकाययोग रह गया । यह स्थिति बतायी जा रही है उन अरहंत भगवान के अंतिम समय की, जिसके बाद उनको अयोगकेवली भगवान की स्थिति प्राप्त होनी है । जिस समय समस्त योगों को नष्ट कर के सूक्ष्मयोग में आ गए तो क्या होता है, उसका वर्णन करते हैं ।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव_-_श्लोक_2171&oldid=83959"
Categories:
  • ज्ञानार्णव
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:33.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki