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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2195

From जैनकोष



परमेष्ठी परं ज्योति: परिपूर्ण: सनातन:।

संसारसागरोत्तीर्ण: कृतकृत्योऽचलस्थिति:।।2195।।

प्रभु की स्वपरपरमोपकातिा―जिसके लिए लोग मैं-मैं कहा करते हैं―मैं आया, मैं करता, मैं पढ़ता, मैं हूँ, वह मैं जब केवल मैं रह जाय, अन्य कुछ भी चीज उस मैं के साथ न रहे तब इसका ऐसा ज्ञानप्रसार होता है, समस्त कलंकों का ऐसा ध्वंस होता है कि वहाँ अपने आप में भी अचिंत्य चमत्कार प्रकट होता है और समस्त लोक के जीव भी उनके निमित्त से अपना भला कर लेते हैं । ऐसे सिद्ध भगवान के स्मरण में यह प्रकरण चल रहा है। ये प्रभु परमपद में स्थित हैं । प्रत्येक मनुष्य चाहता है कि मैं ऊँची से ऊँची स्थिति में पहुंचूं । जब दुनिया की ओर दृष्टि जाती है तो यह गम नहीं खाता, संतुष्ट नहीं हो पाता । उसकी यही भावना बनी रहती है कि मैं विश्व में सबसे अधिक धनिक बनूं । लोग तो सोचते हैं कि मुझे इतना धन मिल जाय तो मैं संतुष्ट हो जाऊँगा, पर होता क्या है कि उतना मिल जाने पर फिर असंतोष की लहर दौड़ जाती है । लोग तो इस विश्व में ऊँचे से ऊँचे पद में स्थित होना चाहते हैं । जरा सोचो तो सही कि इस दुनिया में कोई स्थान है क्या कि जो ऊँचा से ऊँचा कहा जा सके । यहाँ के सभी पद क्लेशों से भरे हुए हैं । क्लेशरहित सर्वोच्च पद में स्थित हैं तो यह सिद्ध भगवान । ये सिद्ध भगवान परमपद में स्थित हैं । ये परमज्योतिर्मय उत्कृष्ट ज्ञान-स्वरूप हैं । क्या है उनके? केवल सत्यप्रकाश । जिनके पास कुछ है उनसे ऐसी आशा नहीं की जा सकती है कि उनकी उपासना से कुछ मिल जाय, पर जिनके पास कुछ नहीं है उनकी उपासना कर के यह आशा की जा सकती है कि कुछ मिल जाय । जैसे समुद्र लबालब पानी से भरा हुआ है, पर उससे कोई अपनी प्यास नहीं बुझा सकता है और न उसमें से कोई नदी भी निकलती है, लेकिन ये पहाड़, जहाँ कुछ भी नजर नहीं आता, पानी का जहाँ नाम नहीं वहाँ से कितनी ही नदियां निकलती हैं, कितने ही झरने झरते हैं । तो हे नाथ! आपके पास ये धन वैभव परिजन आदि कुछ भी नहीं रहे, आप अकिंचन हो गए, कुछ भी नहीं रहा आपके पास, लेकिन आपकी उपासना से हमें आशा है किं मैं सर्व स्वहित प्राप्त कर सकता हूँ ।

प्रभुभक्ति का उदाहरण―एक बार राजसभा में गुरुवों की चर्चा चल रही थी । लोग कहते थे कि मेरे गुरु ऐसे हैं, मेरे गुरु ऐसे हैं । तो एक जैन श्रावक बोल उठा कि मेरे गुरु शांत हैं, विशुद्ध आचरण रखने वाले हैं, जगत के जीवों पर सच्चा प्यार रखने वाले हैं । तो कोई एक व्यक्ति बोल उठा कि ऐसी बात नहीं है । तुम्हारे गुरु तो कोढ़ी होते हैं । उसने किसी निर्ग्रंथ मुनि को कोढ़ी देखा था । पर यह नियम तो नहीं हो सकता कि जो कोढ़ी हो वह पवित्र न हो सके । लेकिन उसने ऐसी निंदा की । उस समय उस श्रावक ने और कुछ तो न कहा, पर यही कहा कि मेरे गुरु कोढ़ी नहीं होते । तो राजा ने उस व्यक्ति से कहा कि तुम इनके गुरुवों को कोढ़ी बताते हो । हम देखेंगे, अगर कोढ़ी न होते होंगे तो तुम्हें दंड मिलेगा । वह आलोचना करने वाला व्यक्ति जब घर गया और स्त्री से उस विषय में चर्चा की, तो स्त्री कहती है कि अरे क्या हर्ज था―कोई गुरु अगर कोढ़ी हो, रोगी हो, उपद्रवों से ग्रस्त हो तो क्या उससे उस गुरु की गुरुता मिट जाती है? तो वह व्यक्ति बोल उठा कि अब तो मैंने बोल दिया है, अब क्या किया जा सकता है? तो स्त्री बोली कि इसका और तो कोई इलाज नहीं है, केवल एक उपाय है । तुम उन्हीं गुरु के पास जावो जिन्हें उसने कोढ़ी देखा था, उनसे इस घटना को बताकर निवेदन करो । गया वह शाम के समय । संध्या से पहिले गुरु को नमस्कार कर के बोला वह श्रावक―महाराज मैंने बहुत अपराध किया । सारी घटना सुनायी―मैं यों बोल उठा, अब क्या होगा? मेरी हँसी होगी, मुझे दंड मिलेगा, इसकी तो मुझे परवाह नहीं, पर इससे धर्म की अप्रभावना होगी । खैर, गुरु ने कहा―तुम जावो, विश्राम करो । वह घर चला आया । तो शाम के समय रात्रि में ध्यान करते हुए उस साधु ने प्रभुभक्ति की, और उस भक्ति में एक स्तवन रच डाला जिसका नाम है एकीभावस्तोत्र । भक्ति में बोल उठा―ओह ! भगवान की भक्ति से तो भवभव में संचित किये हुए दुर्निवार पापों का समूह भी नष्ट हो जाता है तो इसमें क्या आश्चर्य है कि जो संसार के दुःख दूर हो सकें ।

नमस्करणीय प्रभुस्वरूप―भैया ! श्रद्धा कीजिए―प्रभुभक्ति में अद्धृत सामर्थ्य है । एक णमोकार मंत्र जिसका वाच्य केवल आत्मविकास है, जिसमें पक्षपात की गंध नहीं, लेकिन आत्मा की साधना के लिए एक लोगों की द्दष्टि में दीवाना बनकर निकले, वही तो हमारा गुरु है, और ऐसे गुरुराज आत्मसाधना के बल से जब घातक कर्मों का ध्वंस कर देते हैं तो वही तो हुआ सर्वज्ञ अरहंतदेव । और जब शरीर से भी रहित केवल ज्ञानमात्र आत्मतत्त्व रह जाता है उसे कहते हैं सिद्धदेव । अहो ! कितना निष्पक्ष यह नमस्कार मंत्र है, केवल आत्मा के विकास की पूजा है, किसी देव का नाम नहीं, किसी गुरु का नाम नहीं, केवल आत्मविकास का स्मरण है, प्रभुभक्ति का अद्भत प्रताप है, पर हो तो निष्कपट । जिस बालक का अपने पिता के प्रति निष्कपट प्यार होता है उस बालक को यह अधिकार है कि पिता से कभी हठ भी कर सकता है । यदि हम आपके हृदय में प्रभु के प्रति ऐसा निष्कपट प्यार हो, उनके गुणों का ऐसा अनुराग हो तो हम आप कभी स्तवन में प्रभु से कुछ हठ भी कर सकते हैं ।

प्रभुभक्ति का प्रसाद―वे मुनिराज जिनका नाम था वादिराज-स्तवन करते-करते एक बार बोल उठे कि हे नाथ! जब आप स्वर्ग से भी यहाँ न आये थे, उससे 6 महीना पहिले से नगर में रत्नों की वर्षा हो रही थी तो कुछ हमने आपको ध्यान के द्वार से बुलाकर अपने हृदय के मंदिर में विराजमान कर लिया । अब तो यह शरीर स्वर्णमय हो जाय तो इसमें आश्चर्य क्या? ओह ! उस परमभक्ति का माहात्म्य देखो कि उनका सारा कोढ़ दूर हो गया । देदीप्यमान स्वर्णवत् उनका शरीर होने लगा, इतने में ही उन्हें ख्याल आया कि उस व्यक्ति ने जिसने मुझे देखकर कोढ़ी बोल दिया है, राजा यदि इस बात को झूठ साबित कर देगा तो बड़ा दंड देगा । उससे तो एक बहुत बड़ी अप्रभावना होगी । सो उन्होंने उस व्यक्ति के प्राण बचाने व अप्रभावना न होने हेतु अपनी छिंगुली (छोटी) अंगुली को बड़े जोर से दाब लिया ताकि उसका कोढ़ न खतम होने पाये । सो उस छिंगुली में कोढ़ रह ही गया । जब राजा ने उन मुनिराज को देखा तो वहाँ तो कोढ़ का नाम न दिखा । उस निंदा करने वाले व्यक्ति पर राजा को बड़ा क्रोध आया । तो मुनिराज बोले―राजन् ! क्षमा करो, उसका कोई दोष नहीं है । देखो यह कोढ़ जो हमारी इस छिंगुली में स्थित है वह सारे देह में स्थित था । लो राजा के ज्ञान जगा और उस निंदा करने वाले व्यक्ति को क्षमा कर दिया ।

स्वसुख में अन्य का असहयोग―भाई भगवान का प्रताप हृदयंगम कीजिए, केवल एक परिजनों के मोह से ही निस्तारा न होगा, ये कोई भी लोग तुम्हारा कल्याण न कर देंगे । एक सेठ था, उसके चार लड़के थे । 5 लाख की जायदाद लड़कों को बाँट दी और 1 लाख की जायदाद अपने पास रख ली । तो सेठ ने जिस कमरे में वह रहता था उसमें भीत के अंदर गड्ढों में सोना, चाँदी, रत्न जवाहरात जो कुछ भी उसके पास था रखकर उन गड्ढों को बंद करवा दिया था । लड़कों को सब पता था । जब वह मरने लगा, बोल बंद हो गया, कान जरूर सही काम कर रहे थे, उस समय पंच लोग आये । कहने लगे―सेठ जो, अब तो आपका अंतिम समय है, जो कुछ दान पुण्य करना हो कर जावो, वह सब धन धर्मकार्य में लगा दिया जायगा ।सेठ को वह बात अच्छों जंची, वह बोल तो न सकता था, पर इशारा कर के बताने लगा कि वहाँ जो धन रखा है वह सब धर्मकार्यों में लगा देना । उस इशारे को वे पंच लोग न समझ सके । पंचों ने लड़कों को बुलवाकर पूछा कि भाई सेठ जी क्या कहते हैं? तो वे लड़के कहते हैं कि सेठ जी इस बात का इशारा कर रहे हैं कि हमारे पास जो कुछ था वह सब इन भींतों के चिनवाने मे लगा दिया, अब हमारे पास कुछ नहीं बचा, वह बेचारा सेठ यह चाहकर भी कि मेरा धन धर्मकार्य में लग जाय, पर बोल न सकने के कारण उसे धर्मकार्यों में न लगा सका ।लड़कों की बातें सुनकर वह मन ही मन कुढ़ रहा था । तो भाई यहाँ किसका विश्वास बनाया जाये कि कोई हमें कल्याण करने में मदद दे देगा? कोई नहीं है ऐसा ।

आत्मोद्धारक के वास्तविक पितृत्व―एक ब्राह्मण की लड़की ने किसी नग्न दिगंबर गुरुराज का उपदेश सुना और 5 पापों के त्याग का नियम उन गुरुराज से लिया । जब घर आयी, अपने पिता से बताया तो उसका पिता उस पर बहुत नाराज हुआ । बोला―तुमने क्यों बिना मेरी आज्ञा के ऐसे नियम लिये, और क्यों उस गुरु ने तुझे ऐसा नियम दिया । चलो चले ऐसे मुनि के, पास देखें तो सही कि कौनसा वह मुनि है? चलते-चलते रास्ते में देखा कि एक व्यक्ति फांसी पर लटकाया जा रहा था । लड़की ने पूछा―पिता जी यह व्यक्ति क्यों फांसी पर लटकाया जा रहा है? तो बताया कि इसने किसी व्यक्ति की हत्या की है इससे फांसी पर लटकाया जा रहा है । तो वह लड़की बोली―पिताजी तब फिर मैंने उस हिंसा का (हत्या का) त्यागकर दिया तो कौनसा बुरा किया ?....अच्छा बेटी चल इस एक नियम को रख ले, पर और चार नियम तो छोड़ दे । आगे चले तो देखा कि एक व्यक्ति की जिह्वा का पुलिस के द्वारा छेदन किया जा रहा था, लड़की ने पूछा―यह व्यक्ति क्यों दंडित किया जा रहा है? तो बताया कि इसने झूठ बोला है । ....तो पिताजी मैंने झूठ बोलने का त्याग कर दिया तो कौनसा बुरा किया ?....अच्छा बेटी तू इन दो नियमों को रख ले, पर अन्य तीन नियमों को तो त्याग दे । आगे चले तो देखा कि पुलिस के लोग एक व्यक्ति को हथकड़ी डाले हुए लिए जा रहे थे ।...पिताजी इसका क्या मामला है ?....इसने चोरी किया है । ....तो फिर मैंने चोरी का त्याग किया तो क्या बुरा किया ?....अच्छा बेटी तू इन तीन नियमों को रख ले, पर दो तो छोड़ दे । कुछ और आगे बढ़े तो क्योंकि एक व्यक्ति बहुत से लोगों द्वारा एक जगह खूब पीटा जा रहा था । लड़की ने पूछा―पिताजी इसका क्या मामला है ?....बेटी इसने कुशील सेवन है ।.. .तो पिताजी मैंने कुशील को त्याग दिया तो क्या बुरा किया?...अच्छा बेटी तू इन चार नियमों को रख ले, पर एक नियम तो त्याग दे । कुछ और आगे बढ़े तो देखा कि पुलिस के लोग एक व्यक्ति को बाँधकर लिए जा रहे थे ।....पूछा, इसका क्या मामला है ? तो बताया―बेटी इसने तृष्णा करके दूसरों पर अन्याय किया है । ....तो पिताजी मैंने इस तृष्णा को त्याग दिया तो क्या बुरा किया ?....अच्छा बेटी तू सभी नियम रख ले, पर चल देखें तो सही कि वह कौनसा मुनि है जिसने तुझे ये नियम दिए हैं । पहुंच गए मुनिराज के पास तो वह पुरुष बोला―मुनिराज तुमने मेरी बेटी के क्यों 5 नियम दिये? तो वह मुनि कहता है―यह बेटी तुम्हारी नहीं, यह तो मेरी है ।.. .यह कैसे? उस समय दर्शकों बड़ा ठट्ट जुड़ गया । तो उस मुनि ने उस लड़की के सिर के ऊपर हाथ की छाया कर दी आशीर्वाद रूप में । उस लड़की को अपने पूर्वभव का स्मरण हुआ और जो कुछ भी उस लड़की ने पूर्वभव में ज्ञानार्जन किया था वह सब धाराप्रवाह से बोल उठी । तो वास्तव में हम आप संतान तो उनके हैं जो हम आपको हितमार्ग में लगायें । लोग कहा करते हैं कि हम वीर की संतान हैं । अरे वीर के तो संतान ही नहीं हुए, शादी वगैरह तो हुई नहीं, फिर वीर के संतान क्यों कहते? ....अरे उन्होंने हम आप सबको हितमार्ग में लगाया इससे अपने को महावीर की संतान कहते हैं । यहाँ निष्कपट प्यार तो वह है जो हितमार्ग में लगाये । तो वे प्रभु परमज्योतिस्वरूप हैं, परिपूर्ण सनातन हैं, कृतकृत्य हैं, ये भगवान सिद्ध इस चतुर्थ शुक्लध्यान के प्रताप से बने हैं ।अयोगकेवली गुणस्थान के प्रताप से शेष कर्मों का विनाश हुआ कि सिद्ध पद प्राप्त हो जाता है ।


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