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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2198

From जैनकोष



यतोऽनंतगुणानां स्यादनंतांशोपि कस्यचित् ।

ततो न शक्यते कर्तुं तेन साम्यं जग्रत्रये ।।2198।।

प्रभु के अनंत वैभव की तुलना बताने के लिये तीन लोक में पदार्थो का अभाव―कहते हैं कि अनंत गुणयुक्त भगवान की समता हम किससे करें, जिसका अनंतवा अंश भी ज्ञान और आनंद किसी के पाया जाय तो क्या उससे तुलना कर देना युक्त बात होगी? प्रभु अनंत विकासमय हैं, और यहाँ प्रभु के विकास का अनंतवां भाग विकास वाला है, तो किसका उदाहरण लेकर प्रभु का वैभव बताया जाय? जो एक विशुद्ध ज्ञान में मग्न है, जिससे ज्ञान में रंचमात्र भी रागद्वेष की तरंग नहीं है, निरंतर एक समान ही जिसका ज्ञान चल रहा है, ऐसे परमपुराण पुरुष सिद्ध महाराज की परमनिराकुलता निरंतर बर्त रही है । इससे उत्कृष्टपद और क्या हो सकता है? जो यहाँ का मोह छोड़ सकता है, जो असार संसार के विषयसाधनों का परित्याग कर सकता है वह ही तो इस पथ पर चल सकेगा, कायर तो नहीं चल सकते । एक बार बुंदेलखंड में टीकमगढ़ स्थान में एक पहलवान आया, वह कुश्ती में विश्वविजयी था । वहाँ पहुंचकर उसने कह दिया कि हम अपनी कुश्ती की कला दिखायेंगे । जो चाहे सो हम से लड़ सकता है । किसी को साहस न हुआ । तब एक अत्यंत दुबला पतला आदमी उठा, जिसने कभी कुश्ती भी न लड़ी थी, वह बोला कि हम इससे लड़ेंगे, मगर अभी नहीं । यह थक करके आया है, इसको पंद्रह दिन का समय दो, अपनी थकन मेट ले, और खा पीकर खूब तैयार हो जाय तब लड़े । यों पहिले हो उसने धमकी देकर उसको घबड़वा दिया । जब 15 दिन के बाद में कुश्ती लड़ने का समय आया तो दोनों आ गए लड़ने के लिए ।वह दुबला पतला पुरुष साहस भरे शब्दों में कहता है कि तुम कौनसी कुश्ती लड़ोगे? सिर मसकने की कुश्ती लड़ोगे या दाँव पेंच की? तो वह पहलवान बोला कि सिर मसकने की कुश्ती लड़ेंगे । वह पहलवान―कौनसी कुश्ती लड़ोगे, ऐसा सुनकर और भी घबड़ा गया । वह दुबला पतला आदमी कहता है अच्छा पहिले तू हमारा सिर मसक । उसने सिर मसका तो उसे अभ्यास था, सहन कर लिया । अब सिर मसकने की कुश्ती में तो एक कला की बात है ।हर एक में तो सब जानकारी नहीं होती, कहां नस है, कहाँ मसकना, क्या करना, वह तो एक ज्ञान संबंधी बात है । तो जब उस दुबले पतले आदमी ने उसके सिर को मसल दिया तो वह पहलवान बोल उठा-बस छोड़ दो, अब तुम जीत गए । तो साहस की बात बतलाते हैं कि साहस हो तो क्या नहीं किया जा सकता । और आत्मकल्याण के लिए साहस कहीं खरीदना नहीं है, उसमें किसी पर की अपेक्षा नहीं है । दृढ़ता से चित्त में एक चिंतन ही तो करना है कि मुझे शांति मिल सकती है तो मेरे को केवल मेरे दर्शन से अनुभव से ही मिल सकती है । तो ऐसे शुद्ध चैतन्यतत्व की जिसने उपासना की हो, वह होता है कर्मों से मुक्त ।उस मुक्त पुरुष के वैभव की यह बात चल रही है ।


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