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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2207

From जैनकोष



इति कतिपयवरवर्णैर्ध्यानफलं कीर्तितं समासेन ।

निःशेषं यदि वक्तुं प्रभवति देव: स्वयं वीर: ।।2207।।

ग्रंथसमाप्ति पर अंतिम कथन―ग्रंथकार कहते हैं कि यहाँ कुछ वर्णन के द्वारा संक्षेपमें ध्यान का फल बताया है, पर पूर्णरूप से यदि कहने के लिए कोई समर्थ है तो वह स्वयं वीरप्रभु ही समर्थ है । ध्यान के फल को हम किन शब्दों में कह सकते हैं, संकेत ही है । तो यह संकेत उनको रास्ता दिखाता है जिनको कुछ-कुछ परिचय है । शब्द में यह सामर्थ्य नहीं कि अपरिचित को भी स्पष्ट चित्रण करा दे, तो कुछ शब्दों से वर्णन किया गया है । यह आचार्य की भाषा है, किंतु आपने समझा ही है कि कितनी उत्तम रीति से ध्यान का उपाय और ध्यान के फल आदिक सब वर्णन आचार्य महाराज ने किये । इस प्रकार यह ज्ञानार्णव ग्रंथ की समाप्ति हो रही है । अब उपसंहार रूप में आचार्यदेव कह रहे हैं ।


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