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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 34

From जैनकोष



प्रसादयति शीतांशु: पीडयत्यंशुमान् जगत्।

निसर्गजनिता मन्ये गुणदोषा: शरीरिणाम्।।34।।

गुणग्राहिता व दोषग्राहिता― आचार्य महाराज उत्प्रेक्षा अलंकार में कहते हैं कि देखो चंद्रमा जगत को प्रसन्न करता है और संताप को नष्ट करता है और सूर्य पीड़ित करता है अर्थात् ताप को उत्पन्न करता है। जैसे यह दोनों बातें इन दोनों में स्वभाव से हैं इसी प्रकार जीवों के गुण दोष स्वभाव से हुआ करते हैं ऐसा मैं मानता हूँ। जिसकी जैसी योग्यता है वह अपनी ही योग्यता के अनुसार वही बाहर में निरखेगा। जिसे दूसरों के गुण ग्रहण करने की प्रकृति पड़ी हुई है वह अपनी उस योग्यता के अनुसार सर्वत्र गुणों को देखेगा और जिसके दूसरों के दोषों को देखने की प्रकृति आ गई है वह सर्वत्र दोषों को देखेगा, इसमें दोष क्या है, यहएक स्वभाव की बात है।पढ़ेलिखों में भी दोनों प्रकार के स्वभाव वाले लोग पाये जाते हैं।

दोषग्रहण में अलाभ― यहाँ शिक्षा लीजिये कि इसमें महत्व की बात, गुणों की बात, अनोखी बात, हितकारी बात क्या निकलती है उसे परखने के लिये अपने आपको तैयार बनाये रहना है।पढ़े लिखे लोग कुछ ऐसे भी होते हैं और सामर्थ्य भी उनमें ही हो सकती है ऐसी कि किसी उपदेश में दोष ढूँढ़ निकालें कि आखिर इसमें दोष क्या है, इसमें खोटी बात क्या है, कहाँ चूक हुई है? उसके ही निरखने में बुद्धि सदा तैयार बनी रहती है, ऐसे ही बिना पढ़े लिखे भी दोनों प्रकार की प्रकृति वाले जीव पाये जाते हैं। कोई गुण देखने का भाव रखते हैं और कोई दूसरे के दोष देखने का भाव रखते हैं किंतु यह तो विचारो कि अपने को अपनाहित करना है ना? तो गुणी पुरुषों के गुण विचारना अच्छा है न कि दोष विचारना अच्छा है।

प्रकृति का उद्घाटन― जिसमें जैसी प्रकृति है, बहुत उपाय कर लेने के बावजूद भी वह अपनी प्रकृति से ही प्रभाव पैदा करता है। एक सेठ के तीन लड़के थे, पर वे तीनों लड़के तोतले थे। पहिले समय में खवास वर ढूँढ़ने जाया करता था। सो सेठ के तीनों लड़कों के देखने के लिये खवास गया। सेठ ने तीनों लड़कों को खूब सज़ा दिया था और समझा दिया था कि देखो जब खवास देखने आये तो तुम लोग चुप रहना। खवास जब उन लड़कों को देखने पहुँचा तो उसे वे लड़के बड़े सुंदर जँचे। उसने उनकी थोड़ी प्रशंसा कर दी। प्रशंसा सुनकर एक लड़के से न रहा गया, बोल ही दिया― अले अभी टढन मंडन तो लडा ही नहीं है, नहीं तो बड़े टुंडर लडते। याने अभी चंदन वगैरह नहीं लगा है नहीं तो हम और भी सुंदर लगते। तो दूसरा लड़का बोला― डड्डा ने कहा था, टुप रहना, याने चुप रहो दद्दा ने कहा था कि बोलना नहीं, तीसरे ने भी बोल दिया टुपटुप। लो उनकी तो सारी पोल खुल गई। तो जिसमें जैसी योग्यता है उसके अनुसार ही उसमें परिणमन होगा।

गुण दोष का विवेक― मूल से अभ्यास करने का अर्थ यह हे कि अपने आपकी आत्म भूमि को स्पष्ट यथार्थ बना लो। गुणग्राहिता की बात मन में आना चाहिये। दोषग्राहिता से अत्यंत दूर रहें। हाँ हमें यदि दूसरों के संग में रहना है तो विचार यह करना पड़ेगा कि यह गुणी है अथवा दोषी है? वह इसलिये विचारना है कि कहीं धोखा न खा जायें, क्योंकि बिना ही प्रयोजन, कुछ वास्ता नहीं और दोष ग्रहण करने की एक आदत सी बनाये रहे तो वह निरंतर अशांत रहना पड़ेगा और स्वयं का उपयोग दोषमय बनाये बिना कोई दोषों का ग्रहण भी नहीं कर सकता। उपयोग में तो दोष आ गया।


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