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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 352

From जैनकोष



भवभ्रमण निर्विष्णा भावशुद्धिं समाश्रिता: ।संति केचिच्च भूपृष्ठे योगिन: पुण्यचेष्टिता: ॥352॥

धुन बिना हितकारी ध्यान की साधना नहीं बन सकती । इन समस्त संबंधों का निमित्त नैमित्तिक संबंधों का ज्ञान कर लिया, एक बार हो गया, दो, चार बार समझ लिया, बोल लिया, पर इतने मात्र से संतोष मत करो । हमें निरंतर दृष्टि वस्तु के एकत्वस्वरूप पर रखने का यत्न करना चाहिए । एक आत्महित के लिए अपने आपमें अपने आप पर ही दया करके सोचने की बात कही जा रही है । जिन पुरुषों ने तत्त्वार्थ का सही निर्णय किया है अतएव पर से उपेक्षित होकर मोक्ष और मोक्षमार्ग में जिनके अनुराग जगा है और इस ही कारण संसार जनित सुखों में जिनकी वांछा नहीं रही, ऐसे संयमी मुनि प्रशंसनीय ध्याता हैं ।पुण्यचेष्टित यागियों की विरलता तथा इस काल में भी संभवता –इस पृथ्वीतल पर अनेक योगिश्वर संसार चक्र से विरक्त हैं, शुद्ध भावों से परिपूर्ण हैं, पवित्र चेष्टा वाले हैं, ऐसे संयमी संतजन प्रशंसनीय ध्याता होते हैं । यद्यपि कुछ ऐसा जचता होगा कि जैसे योगिश्वरों की प्रशंसा की जा रही है ऐसे योगिश्वर इस काल में तो दिख नहीं पड़ते, जो संसारचक्र से अति विरक्त हैं, निरंतर एक शुद्ध ज्ञानप्रकाशमात्र अंतस्तत्त्व में अनुरक्त ऐसे पवित्र चेष्टावान निष्पृह योगिश्वर इस काल में तो यहाँ नजर नहीं आते, तो क्या यह केवल ग्रंथ की लिखी हुई बात है ? समाधान में यों समझिये कि ऐसे योगीश्वर हुए थे और आज कल भी जहाँ कहीं होंगे, अभाव तो अभी नहीं है, किंतु जो योगीश्वर केवल एक आत्मस्वरूप के दर्शन के यत्न में रहते हैं, जैसे धनिक लोग इतना धनसंचय हो, इतना और हो, जैसे उस उस ओर ही भाव रखा करते हैं ऐसे ही योगी अब आत्मानुभव हुआ, आत्मदर्शन हुआ, अब यही और देर तक रहे ऐसी एक आत्मानुभव के लिए ही की धुन रखा करते हैं । ऐसे योगी ही विशुद्ध आनंद का अनुभव करते हैं, और कर्मों की निर्जरा करते हुए मोक्षमार्ग में बढ़ते हैं ।


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