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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 378

From जैनकोष



आत्मयत्तं विषयविरसं तत्त्वचिंतावलीनं,

निव्यापारं स्वहितनिरतं निवृतानंदपूर्णम् ।ज्ञानारूढं शमयमतपोध्यानलब्धावकाशं,

कृत्वाऽऽत्मानं कलय सुमते दिव्यबोधाधिपत्यम् ॥378॥

आत्मा को आत्माधीन करने का स्मरण – हे आत्मन् ! यदि तुझे संसार के संकटों से छूटकर अनंत आनंद का ही अनुभव करते रहने का प्रोग्राम है तो देख प्रथम तो तू अपने आपको पराधीनता से छुड़ाकर स्वाधीन बना । यह सबसे पहिली बात है करने की’ जिसे निवार्ण चाहिए, प्रभुता चाहिए उसका कर्तव्य है कि सर्वप्रथम वह अपने को स्वाधीन तो अनुभव करे । जब तक यह आत्मा सबसे निराले एक अपने आपके स्वरूप को नहीं निहार सकता है तब तक वह मुक्ति का पात्र ही नहीं है । तो सर्वप्रथम तू अपने आपको आत्माधीन बना । यह सब एक ज्ञानप्रकाश से ही संभव है । जहाँ ही माना कि मुझे अमुक परिवार से सुख है और इन सबकी मैं रक्षा करता हूँ, ऐसी ही कल्पनाएँ जगी कि अपने आपको पराधीन बना लिया । जगत के सभी जीव स्वतंत्र हैं मैं भी स्वतंत्र हूँ, प्रत्येक का स्वरूप अपने आपके प्रदेश में है । किसी के प्रदेश किसी अन्य में प्रयुक्त नहीं होते हैं, अतएव सर्व पदार्थ स्वतंत्र हैं, ऐसी स्वाधीनता का निर्णय करने से ही अपने आपको स्वाधीन बनाया जा सकता है । किसी द्रव्य को किसी द्रव्य का स्वामी, कर्ता भोक्ता निहारा तो समझो कि अभी हमारी दृष्टि शुद्ध सहज स्वाधीन सत्त्व में नहीं गई । हम कैवल्य अवस्था प्राप्त कैसे कर सकते हैं ? जिन्हें कैवल्य स्थिति की अभिलाषा हो उनका प्रथम कर्तव्य है कि वे अपने आपको पराधीनता से छुटाकर स्वाधीन बनायें ।

आत्मा को विषयविरक्त, तत्त्वचिंतनलीन, निव्यापार, स्वहितनिरत, निर्वृतानंदपूर्ण व ज्ञानारूढ़ करने का अनुरोध – उपयोग में स्वाधीन बनने के पश्चात् फिर दूसरा कदम होना चाहिए कि अपने को इंद्रिय के विषयों से विरक्त करें । वस्तुविज्ञान प्राप्त करने का फल यही है कि इंद्रिय विषयों में रुचि न रहे । तो दूसरा कदम होगा ज्ञानी पुरुष का यह कि इंद्रिय के विषयों से विरक्त रहे । ये इंद्रियविषय नाना प्रकार से बहकाते हैं, किंतु ज्ञान का ऐसा दृढ़ प्रताप बने कि इन इंद्रियविषयों के बहकाये हम न बहक सकें । तीसरा कदम होना चाहिए कि तत्त्व के चिंतन में लीन हो जायें । ये जगत के समस्त पदार्थ कैसे हैं, वास्तव में इनमें भी कौन सा स्वरूप है जो स्वरूप कभी भी मिटता नहीं है, ऐसी अपने आपके अंत:स्वरूप की दृष्टि बनायें और ऐसे अंतस्तत्त्व के चिंतन में अपने को लीन करें तो यह कदम हमारे मोक्ष मार्ग में साधक होगा । चौथा कदम रखिये सांसारिक व्यापारों से रहित होकर निश्चलता रखने का । तत्त्वचिंतन का वह प्रताप है कि वह तत्त्ववेदी सांसारिक वृत्तियों में नहीं उलझता और उन सांसारिक व्यवसायों से अपने आपको प्रथक् करके निश्चल बना रहा । 5वां कदम यह होना चाहिए कि स्वहित में लग जाय । जैसे अनेक बार विषयों में प्रवृत्ति की उमंग रहती है ऐसी ही धुन अपने आपके हित के लिए बने । मेरा किसमें कुशल है, मेरे आत्मा की उन्नति किस प्रसंग से है इन सब बातों का स्पष्ट निर्णय रखें और अपने हित में लगें । छठा कदम होना चाहिए – अपने आपको निवृत्त बना लें । जैसे निवृत्ति में क्षोभ-रहित आनंद की परिपूर्णता प्रकट होती है ऐसा विशुद्ध आनंदमय अपने आपको बनाने का यत्न करें । यह यत्न होगा अपने आपके स्वरूप को क्षोभरहित निहारने से । मेरे स्वरूप में क्षोभ है ही नहीं ऐसा दृढ़ निर्णय होने से बाह्य में भी आकुलता और प्रतिकूलता में क्षोभ नहीं आ सकता । 7 वाँ कदम हो अपने आपको ज्ञान में आरूढ़ करें, अपनी दृष्टि प्रवृत्ति ज्ञान में लगी हुई रहे कोई पूछे कि तुम्हें क्या चाहिए तुमको जो चाहिए वही हम दें । तो क्या माँगें ? सामने एक ओर रखदें रत्न और एक ओर रखदें खली के टुकड़े और कहा जाय कि तुम्हें क्या चाहिए, जो माँगो सो मिलेगा और माँग बैठे खली के टुकड़े तो उसकी कैसी दयनीयस्थिति कही जाय ? ऐसी ही संसारी प्राणियों की स्थिति है कि निकट तो है अनंत आनंद और जो केवल ज्ञान से ही प्राप्त होता है । जिसके प्राप्त होने में भी कोई श्रम नटखट नहीं करने होते फिर भी उस आनंद निधि को न मांगकर केवल एक विषयसुखों की प्रीति रखे तो उसकी यह कितनी मूढ़ता भरी कल्पना है ।शम, यम, तप और ध्यान का आधार – हे आत्मन् ! यदि मुक्ति की अभिलाषा है तो तू ज्ञान में आरूढ़ बन । इतनी तैयारी जब हो जाती है तब शम, यम, दम, तप और ध्यान की इसके दृढ़ता होने लगती है, कषायें शांत हो जाती हैं । सदैव के लिए यम उत्पन्न होता है । अर्थात् मैं इस शुद्ध ज्ञानस्वरूप में ही रहू्ँ । मेरा ऐसा निर्णय है, मेरी ऐसी प्रतिज्ञा है, मेरा ऐसा हठ है, मेरे आशय में अब कोई दूसरी बातें नहीं आ सकती ऐसा जिसका यम बन गया है, इंद्रिय का दमन करना जिसको अति आसान हो गया है, तपश्चरण तो यों ही सहज चलता रहता है, ऐसी जब दृढ़स्थिति होती है, तो फिर इस आत्मा का दिव्यबोध प्रकट होता है । ज्ञान चमत्कार उत्पन्न होने का मूल साधन इतना है कि अपने आपको निर्मल बनायें । यों दिव्यबोध अर्थात् केवलज्ञान का अधिपतित्व चाहिए तो अपने आपको इन आठ पद्धतियों में लगा दे तो अवश्य ही निज भगवान आत्मा के प्रसाद से कैवल्य की सिद्धि हो सकती है ।


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