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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 385

From जैनकोष



यज्जीवादिपदार्थानां श्रद्धानं तद्धि दर्शनम् ।निसर्गेणाधिगत्या वा तद्भव्यस्यैव जायते ॥385॥

सम्यग्दर्शन का निर्देशन – जीवादिक का श्रद्धान करना सो दर्शन है । यह सम्यग्दर्शन निसर्ग से उत्पन्न होता और परोपदेश से उत्पन्न होता है । होता है भव्य जीव के । जिन्होंने पूर्वकाल में उपदेश पाया है, संस्कार बनाया है उन्हें इस भव में भी बिना परोपदेश मिले, बिना अन्य निमित्त मिले निसर्ग से ही सम्यग्दर्शन हो जाता है । और, किन्हीं को परोपदेश से जिनबिंबदर्शन से या वेदनानुभव से अनेक कारणों को पाकर सम्यक्त्व हो जाता है । सब बात एक लगन की है । अपने आपमें आत्मकल्याण की लगन न हो और पापक्रियावों में ही रति मानते रहें, पापों से विरक्ति न लगे तो कुछ उद्धार की संभावना ही नहीं है । सबसे ऊँची बात बस इस रत्नत्रय में ही मिलेगी । अपने आपमें सही श्रद्धान हो और आचरण विशुद्ध हो इस जगत का क्या है ? न हो अधिक संपदा तो आत्मा का क्या बिगड़ा और हो गयी संपदा तो आत्मा का क्या पूरा पड़ा । यह तो जगत है । आज ऐसी स्थिति है और कल न जानें कौन सा भव धारण करना पड़े । न सम्हले तो हीनभव ही मिलेगा । तो संपदा प्राप्त हुई, समागम प्राप्त हुआ तो कौन सी भलेपन की बात हो गयी । मान लो यहाँ के लोगों ने बड़ा बड़ा कह दिया तो आखिर मोहियों ने ही तो बड़ा बड़ा कहा । ज्ञानी तो धन के कारण किसी को बड़ा नहीं मानता । धन वैभव बाहरी समागमों के कारण कोर्इ बड़ा मानता हो तो मोही, मिथ्यादृष्टि, अज्ञानी ये ही लोग मान सकते हैं ।उपसर्ग में कर्मनिर्जरण की कारणता – भैया ! अज्ञानियों से यदि बड़ा कहलवाने की चाह हो तो धन संपदा की भी वांछा कीजिए । रही यह बात कि इसका दुःख लोगों को रहता है कि लोक में हमारा अधिक सम्मान नहीं है । सब कुछ पैसे के बल पर सम्मान होता है, तो यह भी एक तपश्चरण है, क्या ? कि अज्ञानीजनों के द्वारा सम्मान न हो रहा हो तो उसका खेद न करना । आप समझ सकते हैं ना कि इस स्थिति में कर्मनिर्जरा भी कर सकते हैं । और तो बात क्या, जो साधर्मीजन हैं, अपने ही धर्म के मानने वाले लोग हैं, सधर्मीजन यदि अपमान करें और उस अपमान को समता से सह लें तो इसे कर्मनिर्जरा का कारण कहा है । तो यह बात तो भले के लिए हैं । जिनके विवेक हैं उनके लिए सब संयोग वियोग भले के लिए है । जिनके विवेक नहीं है उनके लिए संयोग वियोग सब पतन के लिए है । मुख्य बात विवेक की चाहिए । अपने आत्मा में लगने की चाहिए । शुद्ध बोध होने में किसका लगाव रखा जाय, जो राग करने वाले, राग दिखाने वाले परिजन, बंधुजन मित्रजन हैं वे क्या हैं ? एक तरह का जैसे सनीमा के पर्दे पर चित्र उकेरे जाते, खेल देखते हैं इस तरह इस आसमान पटपर यह बिल्कुल सनीमा सा दिख रहा है । कौन किसका है, सब भिन्न है, मायास्वरूप हैं, किनमें लगाव रखना है । आत्मकल्याण की धुन जब तक सही मायने में नहीं बनती तब तक धर्म की बात जगती नहीं है । ज्ञानप्रकाश होने पर असली ऊब आ जाती है सांसारिक बातों से और इस ही लगन की जड़ पर सब बात बनती है ।


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