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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 390

From जैनकोष



एकं प्रशमसंवेगदयास्तिक्यादिलक्षणम् ।आत्मन: शुद्धिमात्रं स्यादितरच्च समंतत: ॥390॥

सम्यक्त्व में द्रकटभूत चिन्ह – ये सम्यक्त्व के चिन्ह हैं – प्रशम, सम्वेग, अनुकंपा और आस्तिक्य, किंतु इन रूप जो प्रकट भाव है वह सराग सम्यक्त्व में होता है । वीतराग सम्यक्त्व में तो एक आत्मा की शुद्धि मात्र है । वहाँ न आस्तिक्य का प्रकट विकल्प है, न प्रशम, संवेग, अनुकंपा का प्रकट विकल्प है । इनका परिपाक है । कोई अपराध करे उस पर अपराध पर क्षोभ न आना किंतु धीरता गंभीरता से कुछ निर्णय करना, समतापरिणाम रखना, दूसरे को शत्रु न समझना यह सब प्रशम भाव में होता है । सम्वेग भाव में आत्मगुणों में अनुराग और संसार शरीर भोगों से वैराग्य, इस प्रकार का जो प्रवर्तन है यह सम्वेग भाव है । इसी प्रकार प्राणियों पर दया का भाव होना, उन्हें उपदेश देना, उनको हितमार्ग में लगाना, उनको अज्ञानग्रस्त निरखकर या सांसारिक कष्टों को देखकर चित्त में दया का परिणाम होना ये भी सरागसम्यक्त्व के चिन्ह हैं । जो पदार्थ जिस तरह है, उस तरह से ही है इस प्रकार का निर्णयरूप जो एक संकल्प है वह भी सराग सम्यक्त्व का चिन्ह है । विकल्प तरंग कल्पनाएँ कुछ भी एक भेदरूप बात बनती है तो वहाँ वह राग का ही एक परिणाम है । वीतराग सम्यक्त्व में आत्मा की विशुद्धि मात्र है । सबसे निराले ज्ञानमात्र निज अंतस्तत्त्व का अनुभवन वीतराग सम्यक्त्व में है । पर इसका परिच्छेदन यह वीतराग सम्यक्त्व में नहीं है, यह बात किसी न किसी रागांश को लेकर ही होती है । भले ही रागांश साथ है लेकिन सम्यक्त्व को सराग कहना यह एक उपचार कथन है । सम्यक्त्व राग सहित नहीं होता । सम्यक्त्व तो एक आत्मा की सिद्धि है, किंतु आत्मा की सिद्धि के साथ कुछ रागरहित सम्यक्त्व होने पर जब तक राग रहता है ऐसे सरागी जीव के सम्यक्त्व को सराग सम्यक्त्व कहते हैं । ध्यान के तीन अंग बताये गए – सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र । जब तक अपने आपके आत्मा का सही स्वरूप में विश्वास न होगा तब तक ध्यान किसका करे ? यहाँ वहाँ के बाह्य पदार्थों का ध्यान करने से तो कुछ आत्मा को लाभ नहीं मिलता । रागद्वेष का ही उदय चलता है । सही रूप में अपने आत्मा का श्रद्धान हो तो उसका ध्यान निर्मल बन सकता है । ध्यान के अंगों में प्रधान प्रथम सम्यग्दर्शन अंग की बात चल रही है । यह सम्यग्दर्शन पात्र के भेद से दो प्रकार का है । एक सराग सम्यक्त्व और एक बहिरंग सम्यक्त्व ।


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