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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 394

From जैनकोष



अनंत: सर्वदा सर्वो जीवराशिर्द्धिधास्थित: ।सिद्धेतरविकल्पेन त्रैलोक्यभुवनोदरे ॥394॥

जीव और जीव के भेद – इन तीन लोकरूपी भुवन में जीवराशी सदाकाल अनंत है । यह तो प्रथक्-प्रथक् व्यक्तिगत अपने स्वरूप तत्त्व की दृष्टि से अनंत जीव हैं । उन समस्त जीवों को केवल एक जीवत्वस्वरूप की दृष्टि से देखा जाय तो जीव एक है और व्यवहार नय का आश्रय करके पर्यायावलंबन करके इन जीवों को निरखा जाय तो इसके भेद प्रभेद करते जाइये । बहुत हो जाते हैं । जैसे संसारी और मुक्त ये दो प्रकार के जीव होते हैं, एक वे जो संसारी हैं, संसार में भ्रमण करते हैं, और एक वे जो मुक्त हैं, सांसारिक संकटों से छूट चुके हैं । सिद्ध और संसारी इन दो प्रकार के जीवों को जानकर यथार्थस्वरूप इनका निर्णय करने पर हेय और उपादेय की बुद्धि स्वयं जग जाती है । संसारी होना हेय है, सिद्ध होना उपादेय है । अपने ही गुणों से समृद्धिशाली बन जाना यह उपादेय है और अपने गुणों का घात करके मलिन आशय में बना रहना यह हेय है । एक पदार्थ उतना होता है जितने में एक पदार्थ व्यापकर रहता है, जिससे बाहर वह नहीं रहता है । जो एक है उसमें स्वभाव एक है, परिणमन एक है । उस एक के परिणमन को जो कि अवक्तव्य है, हम समझने के लिए उसमें भेद करके समझते हैं – जो जानता है वह जीव है । जो श्रद्धान करता है वह जीव है । जो अपना आचरण रखता है वह जीव है । भेद करते जाइए, पर कोई पदार्थ जो एक है उसमें जब जो भी परिणमन होता है उस काल में वह परिपूर्ण परिणमन है और वह एक परिणमन है, किंतु जब अनुभव भेद से निरखते हैं तो सब जीवों में अपने-अपने परिणमन का ही अनुभव पाया जाता है । कोई किसी दूसरे के अनुभव को भोग नहीं सकता । चूँकि सबमें अपना-अपना जुदा-जुदा अनुभव है इस कारण वे सब जुदे जुदे जीव हैं । आपका सुख दुःख आप भोगते हैं, हमारा सुख दुःख हम भोगते हैं । प्रत्येक जीव में जो भी परिणमन होता है उसका अनुभवन वही जीव करता है ।तत्त्वज्ञान की शरण्यता – इस जीव का इस लोक में न कोई साथी है न शरण है । अपना ही सम्यग्ज्ञान अपने आपको धैर्य देता है, संमार्ग पर लगाता है और संकटों से बचाता है । मेरा संकटहारी मेरा तत्त्वज्ञान है, दूसरा और कोई नहीं है । कोई पुरुष कितना ही बड़ा धनिक हो, उसके ज्ञान में चलितपना आ जाय तो वह दुःखी रहता है और दूसरे के वश की बात नहीं रह पाती । जो भी अनुभव है वह खुद का खुद में अभिन्न होकर अनुभव किया करता है । यों अनुभव के भेद से जीव के भेद पर निगाह दें तो ऐसे तो अनंतानंत जीव हैं, जिनमें अनंत मोक्ष भी चले गए और अनंत मोक्ष भी जायेंगे, फिर भी वे जीव अनंतानंत हैं और अनंतानंत काल सदा काल रहेंगे । यों उनके स्वरूपास्तित्त्व का और सादृश्य अस्तित्त्व का निर्णय रखकर जीव को समझना यह सर्वप्रथम जरूरी निर्णय करना हो जाता है, जो कल्याणमार्ग में बढ़े हैं, वे इसी उपाय से बढ़े हैं । हम अपने को सबसे निराला केवल ज्ञानानंद स्वरूपमात्र निरखें तो यह दृष्टि ही हमें जगत से उद्धार के लिए हस्तावलंबन का काम देती है, दूसरा कोई मेरे को शरण नहीं है ।


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