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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 4

From जैनकोष



सत्संयमपय:पूरपवित्रितजगत्त्रयम्।

शांतिनाथं नमस्यामि विश्वविघ्नौघशांतये।।4।।

प्रभु शांतिनाथ को नमस्कार― मंगलाचरण के प्रसंग में प्रथम छंद में परमात्मतत्त्व को, द्वितीय छंद में श्री ऋषभदेव को और तृतीय छंद में चंद्रप्रभ भगवान को नमस्कार करके अब इस चतुर्थ श्लोक में शांतिनाथ भगवान को नमस्कार कर रहे हैं। शांतिनाथ भगवान की प्रसिद्धि शांतिकर्ता के रूप में है। इसका आकर्षण एक तो नाम के कारण है कि इस प्रभु का नाम स्वयं शांतिनाथ है। प्रधान आकर्षण एक नाम पर है। नाम का भी बहुत बड़ा आकर्षण होता है, फिर इसके साथ ही ये शांतिनाथ प्रभु पंचम चक्रवर्ती सोलहवें तीर्थंकर और बारहवें कामदेव, यों तीन पद के धारी हुए।

प्रभु का आदर्श― चक्रवर्ती की विभूति का परित्याग करके इन्होंने संयम धारण किया ऐसी चर्या दिखाकर जीवों को पवित्र किया है। अन्य जीव भी इनकी इस उत्कृष्ट चर्या को निरखकर अपनी अत:चर्या पवित्र बना लेते हैं। सत्संयमरूपी जलसमूह के पूर से तीनों लोकों को जिसने पवित्र किया है ऐसे शांतिनाथ प्रभु को समस्त विघ्नों की शांति के लिए नमस्कार करता हूँ।विघ्नों की शांति इस निर्विघ्न सहजस्वरूप की दृष्टि में हो जाती है। और परमात्मा की दृष्टि करके जो शांति मिलती है वह भी निज का स्पर्श होने से मिलती है। वस्तुत: कोई दूसरा प्रभु मुझे शांत कर दे ऐसा नहीं होता, किंतु प्रभु की प्रभुता निरखकर उस प्रभुता के समान जो खुद में प्रभुता बसी हुई हे उसका स्मरण होता है, उससे शांति और समृद्धि होती है।

आत्मप्रभाव का प्रभाव―जैसे किसी दु:खी आदमी को निरखकर सेठ को दया आती है तो यों ही दया नहीं आ जाती, किंतु उस दु:खी आदमी को देखकर उसके ही समान अपने में दु:ख बना लिया कल्पना से, उससे इस सेठ को दया उपजी है। कहीं रास्ते में कोई प्राणी मारा पीटा जा रहा हो, गाड़ी में जुतने वाले भैंसों को बुरी तरह से चाबुक मारते हुए किसी को आपने देखा तो आपके अंदर एक दया उत्पन्न हो जाती है। वह दया आपमें यों ही नहीं हो गई किंतु उसके दु:ख की तरह अपने आपमें भी कल्पना करके जो दु:ख उत्पन्न किया है उससे दया उत्पन्न हुई है। ऐसे ही प्रभु के स्मरण से परमात्मतत्त्व की सुध से एकदम सीधा कल्याण नहीं हो गया, किंतु परमात्मा की सुध से अपने आपमें बसे हुए परमात्मतत्त्व का स्पर्श हुआ है उससे इसका कल्याण जगा है। ऐसे ही प्रभु के गुणस्मरण का माध्यम लेकर स्वयं में एक शुभ कल्पना बनती है। उस कल्पना से इसे शांति प्रकट हुई है।

प्रभुस्मरण में प्रभुता की मुख्यता―इस प्रसंग में शांतिनाथ प्रभु का स्मरण कर रहे हैं। जैनसमूह में भी 24 तीर्थंकरों में से प्राय: ऋषभदेव, चंद्रप्रभु, शांतिनाथ, पार्श्वनाथ, नेमिनाथ प्राय: इन्हीं का विशेषकर नाम आधार लिया करते हैं। इनमें से इस ग्रंथ में भी पार्श्वनाथ और नेमिनाथ के अतिरिक्त इन सबको नमस्कार का वर्णन आया है। किसी तीर्थंकर को छोड़ दे याने नाम न ले इससे कहीं यह बात नहीं हुई कि वे तीर्थंकर नमस्कार के योग्य नहीं हैं या साधारण हैं, किंतु चलती हुई पद्धति में किसी भी प्रभु का नाम ले लें, उस नाम में प्रभुता की मुख्यता है, नाम की मुख्यता नहीं है। इस कारण किसी एक का भी नाम लेने पर सब गर्भित हो जाते हैं। जिस घर में 4-6 भाई बसते हैं उसमें किसी एक भाई का नाम ले लेने से या किसी का नाम आ जाने से वे सब भाई संतुष्ट रहते हैं। वे सोचते हैं कि इसमें हम सब आ गए। नाम में प्रभुता की मुख्यता है और नमस्कार करने वाला, नाम लेने वाला पुरुष अपने हृदय में यह भाव नहीं रखता कि मैं इनको ही नमस्कार करूँ और को नहीं, इस कारण सभी इसमें गर्भित हो जाते हैं।


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