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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 41

From जैनकोष



रजस्तमोभिरुद्भूतं कषायविषमूर्च्छितम्।

विलोक्य सत्त्वसंतानं संत: शांतिमुपाश्रिता:।।41।।

विषय संसार व विश्रांति― संसार, शरीर, भोगों से उदास, विरक्त पुरुष ज्ञानावरण, दर्शनावरण कर्मरूप रज से और मिथ्याज्ञानरूप तम से अथवा रजोगुण, तमोगुण से उद्भूत कषायविष से मूर्छित जगत् के प्राणियों को देखकर सज्जन पुरुष शांत भाव को प्राप्त होते हैं। जैसे स्कूल में उद्यमी लड़के को पिटता हुआ देखकर अन्य बच्चे भी शांत हो जाते हैं, इसी तरह इस जगत् के दु:खी जीवों को निरखकर ये योगिराज स्वयं शांत हो गये हैं। कहाँजायें, क्या करें, कौनसी चीज से यहाँ सुख मिल जायेगा? यों उनका विचार रहता है। उनकी चित्तवृत्ति में यह भाव रहता हे कि परोपकार करो।

परोपकार का लाभ―परोपकार का अर्थ क्या है। जो दीन दु:खी जीव हैं उनकी सेवा करो। दीन दु:खी जीवों की सेवा करने से क्या मिल जायेगा? कोई कहेगा कि इससे यश और नेतागिरी मिल जायेगी। अरे ये तो लौकिक लाभ हैं। परोपकारी को आत्मा का भी लाभ है। वह किस तरह? यों कि जब दीन दु:खियों का उपकार किया जा रहा है, उनकी सेवा की जा रही है तो प्रथम प्रभाव उसका यह होगा कि विषयकषायों की बातें उस समय न आने पावेंगी, क्योंकि चित्त एक विलक्षण प्रकार का उस समय हो रहा है। तो पहिला लाभ तो यह मिला कि विषयकषायों से बचे। दूसरा लाभ यह है कि इस स्थिति में जहाँ कि विषयकषायों को अवसर नहीं मिल रहा और अपने से अधिक दीन दु:खियों को निरखकर अपना स्थिति में उसे संतोष हो रहा है। हम बहुत कुछ अपना कल्याण कर सकने के योग्य हैं। जहाँ यह निर्णय रहता कि ये तो विशेष दीन दु:खी हैं, वहाँ तृष्णा का उदय नहीं होता है, तब की स्थिति में हम आपके अंतस्तत्त्व का विशेष-विशेष स्पर्श कर सकते है। यह है परोपकार में लाभ।

विशुद्ध सेवा― जितना अपना जीवन दीन दु:खियों के उपकार में बीते और उनके उपकार में अपना कुछ समय लगे तो उसमें आत्मा का विशुद्ध परिणाम उत्पन्न होता है, आत्मतत्त्व का स्पर्श होता है। जबकि सुखी पुरुषों की सेवा करने से चित्त में कायरता जगती है, दीनता आती है, आत्मलाभ कुछ नहीं मिल पाता है। हाँजो वास्तविक सुखी हैं, अध्यात्म दर्शन के प्रताप से जिसने परम आनंद पाया है। उनकी सेवा में तो लाभ है, मगर जगत् के लौकिक सुखी जीवों की सेवा से चित्त में कायरता जगेगी और दु:खी जीवों की सेवा से चित्त में वैराग्य और ज्ञानप्रकाश जगेगा। ये योगीजन इस प्राणीसमूह को कषायविष से मूर्छित निरख कर शांतिभाव को प्राप्त हो जाते हैं।


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