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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 432

From जैनकोष



मिथ्यात्वाविरतो योग: कषायाश्च यथाक्रमात् ।प्रमादै: सह पंचैते विज्ञेया बंधहेतव: ॥432॥

बंध के कारण ― बंध के कारण ये 5 हैं – मिथ्यात्व, अविरति, योग, कषाय और प्रमाद । बंध के कारण तो संक्षेप में अध्यवसान हैं, उसके बाद विस्तार करें तो मोह और कषाय हैं । मोह और कषाय का जो परिणाम है विभावरूप उन सबका संचायक शब्द है अध्यवसान। जो अपने आपका स्वरूप से भी अधिक निश्चय कर डाले उसे कहते हैं अध्यवसान । अधि अव सान । हैं ना मोही जीव सर्वज्ञ से भी ज्यादा अपनी दौड़ लगाने को तैयार ? सर्वज्ञ तो जो पदार्थ जैसा सत् है उसको ही जानते हैं, पर ये मोही जीव सत् को भी जानते असत् को भी जानते । जो नहीं है उसको भी जानते । मकान मेरा नहीं, फिर भी जानते कि मकान मेरा है । भगवान तो नहीं जानते कि यह मकान इनका है, पर ये मोही जीव जानते हैं । तो ये मोही जीव प्रभु से भी अधिक जानने की अपनी दौड़ लगाया करते हैं । तो निकट विस्तार से अधर्म के हेतु दो हैं – मोह और कषाय । इसके पश्चात् और विस्तार बनायें तो मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग ये बंध के कारण हैं । अब गुणस्थानों की परिपाटी से भेद बनायें तो मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग ये बंध के कारण हैं । स्व पर का विवेक न रहना, पर से अपना स्वरूप समझना, पर से सुधार बिगाड़ मानना ये सब मिथ्यात्व भाव हैं । प्रतीति में वस्तु की स्वतंत्रता न रहे तो ये सब मोहभाव हैं । किसी विषय का या निश्चयनय के विषय का खंडन करने का प्रोग्राम बना लिया जाये तो उसमें केवल यही यही सूझता है कि ग्रंथ में कोई ऐसा प्रकरण मिल जाये कि वह निश्चय के विषय के खंडन का हमें कुछ आश्रय मिल जाये । चर्चा में या रात दिन यही धुन रहती है – निमित्त से सब सिद्ध करना और निश्चय के विषय का खंडन करना । यद्यपि जीवन ऐसा मध्यस्थ होना चाहिए था कि निश्चय की बात के भी हम जानकार रहें, व्यवहार की बात के भी हम जानकार रहें और अधिकाधिक उद्यम निश्चयनय के आलंबन का करें । कल्याण के लिए ऐसा जीवन होना चाहिए । किंतु जब एक कोई पक्ष बन जाये तो पक्ष की सीमा की बात तो हम कुछ कह नहीं सकते, उसमें तो यही कहना होगा कि निश्चयनय पक्ष की भी अधिक सीमा कर लें तो हानि है, लेकिन व्यवहार पक्ष की कोई अधिक सीमा कर लें तो वहाँ भी हानि है और व्यवहार पक्ष का बीचोंबीच भी बनायें तो दृष्टि में व्यवहार एक से दूसरे का कुछ हुआ, इस अपेक्षा को ढूँढने का विकल्प बनाते रहने से वहाँ हानि है । स्पष्ट लिखा है कुंदकुंददेव ने प्रवचनसार में कि जो व्यवहार का भी खंडन न करके निश्चय का आलंबन करके अपने शुद्धस्वरूप को जानते हैं वे मोह का क्षपण कर सकते हैं । कितनी निष्पक्ष और स्पष्ट बात है ।कल्याणेच्छु का संकल्प ― जिसे कल्याण की चाह है उसको पहिले तो अपने आपमें ही यह भाव दृढ़ कर लेना चाहिए कि कल्याण की बात मिले यही हमारा कर्तव्य है, हमें किसी को कुछ सुनाना नहीं है, किसी को कुछ मानना नहीं है । सुनायें और मनायें भी कभी, मानने की बात तो ठीक नहीं है, सुनाने की बात भी करें कभी तो उसमें हम अपने को ही सुनाते हैं । हम अपने आपको अपने में दृढ़ कर लें, इसके लिए हमारा सब प्रयास है, यह जानन सबसे पहिले आना चाहिए । इस भावना के बिना इस ज्ञानप्रचार के माध्यम से ही सही यदि उपयोग क्षेत्र में उतर आयें तो यह अपने कल्याण से तो गिर गया । हम जो कुछ भोगते हैं अपने आपके परिणमन को ही भोगते हैं, दूसरे लोग कोई हमारे ईश्वर नहीं हैं । जिसको हम मनाने चलें, जिसको हम कुछ अपनी बात मनायें अथवा कुछ अपना पक्ष थोपकर लोगों में हम अपना कुछ नाम करें, ये सब बातें मोह की चेष्टा मात्र हैं । कभी किसी प्रकार नाम भी होता हो तो ये तो जगत् की बातें हैं, किंतु मुझे किसी भी अन्य जीव से कुछ नहीं चाहना है न कोई अन्य जीव मुझे कुछ दे सकता है । इस जगत्​ में सभी जीव अपने आप अकेले अकेले ही अपना विहार, भ्रमण, जन्म, मरण, सुधार, बिगाड़ सब कुछ कर रहे हैं । किसी का कोई साथी नहीं है, मुझे तो मेरा प्रभु ही शरण है । मेरा सहायक मेरा गुरु, मेरा देव, मेरा मित्र मुझमें ही बसा हुआ अंतस्तत्त्व है, उसका ही सच्चा शरण है । इस ओर ही जब दृढ़ भावना बने तब हमारी सब चेष्टायें हमारे लाभ के लिए बनती हैं । पर का उपकार भी स्व के उपकार के लिए है । कोई मनुष्य इस दृष्टि से पर का उपकार करे कि मुझे दूसरे का भला करना है, दूसरे की ही दृष्टि रखे और करे तो भले ही विषयों के भोगने की अपेक्षा कुछ मंदकषाय तो है लेकिन मैं दूसरों का कुछ कर सकता हूँ इस प्रकार का मिथ्यात्व का अनुबंधन करने वाली कषाय साथ है । अपने आप में अपने आपको स्पष्ट होना चाहिए । ज्ञानमार्ग में अपने आपका अपने को भरोसा रखना चाहिए । बातें सुनें सबकी पर अपने आपसे अपने आपका निर्णय लेना चाहिए । केवल एक पक्ष अथवा किसी को मित्र मानकर उसके रंग में ही अपने को रंगते रहने का कार्यक्रम न रखना चाहिए । निर्णय करें अपने आपसे कि हम इस प्रकार मानते हैं और बोलते हैं, सुनाते हैं, समर्थन करते हैं, इस प्रक्रिया में हमने शांति का कितना अनुभव किया ? सब पुरुषार्थ करना शांति के अर्थ हुआ करते हैं । शांति न मिले तो सब बातें ही बातें रहीं । धर्म का संबंध नहीं हो सका । यहाँ बंध की चर्चा कर रहे हैं कि बंध के हेतु क्या हैं ? एक इस निरपेक्ष सहज अंतस्तत्त्व के परिचय के बिना जो भी हमारी चेष्टायें होती हैं, सब बंध के कारण हैं ।बंधहेतुवों का गुणस्थानानुसार विभाग ― यहाँ 5 प्रकार के बंध हेतु कहे हैं, उसमें यह विभाग करना कि मिथ्यात्व गुणस्थान में तो 5 ही हेतुवों से बंध हो रहा है ― मिथ्यात्व, अविरति, कषाय, प्रमाद और योग । दूसरे, तीसरे, चौथे और पाँचवे गुणस्थान में अविरति, प्रमाद, कषाय और योग ― इन चार कारणों से बंध होता है । 5 वें गुणस्थान में कुछ व्रत परिणाम हैं और कुछ अव्रत परिणाम भी हैं । छठे गुणस्थान में प्रमाद, कषाय और योग इन तीन कारणों से बंध होता है और 7 वें से लेकर 10 वें गुणस्थान तक कषाय और योग इन दो कारणों से बंध होता है और 11 वें, 12 वें, 13 वें गुणस्थान में योग से बंध होता है किंतु उसका नाम बंध नहीं है । रूढ़ि से बंध नाम है क्योंकि जो योग पहिले गुणस्थान में बंध का सहकारी कारण था उस योग का नाम बदनाम है अतएव बंध का हेतु कह लो पर वह तो ईर्यापथ आस्रवहै । जहाँ दो समय की स्थिति बने उसे बंध कहते हैं । यों मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग ये बंध के कारण हैं । त्यागरूप परिणाम न होने को अविरति कहते हैं और चारित्र में असावधानी के परिणाम को अथवा उस निर्विकल्प ध्यान में अनुत्साह के परिणाम को प्रमाद कहते हैं, क्रोध, मान, माया, लोभरूप जो परिणमन है उसे कषाय कहते हैं और आत्मा के प्रदेश का जो परिस्पंद है, जो कि मन, वचन, काय के योग के निमित्त से होता है उसे योग कहते हैं । यह सब सम्यग्दर्शन के प्रकरण में बंध तत्त्व की बात चल रही है । जिससे हमें छूटना है उसके स्वरूप के जाने बिना हमारा छूटने का उद्यम नहीं हो सकता, अत: आस्रव बंध जैसे हेय तत्त्व भी हमें भली प्रकार से समझ लेना चाहिए ।


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