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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 436

From जैनकोष



एवं द्रव्याणि तत्त्वानि पदार्थान् कायसंयुतान् ।य: श्रद्धत्ते स्वसिद्धांतात्स स्यान्मुक्ते: स्वयंवर: ॥436॥

तत्त्वार्थश्रद्धान की मुक्तिसाधकता ― इस प्रकार जो द्रव्यों को, तत्त्वों को, पदार्थों को, अस्तिकायों को मानता है, इनका श्रद्धान करता है वह पुरुष मुक्ति का स्वयंवर होता है अर्थात् उसे मुक्ति प्राप्त होती है । 6 द्रव्यों का इस प्रकार जानना जिसमें प्रत्येक द्रव्य के स्वचतुष्टयात्मकता की ध्वनि चलती रहे । इस प्रकार की प्रतीति सहित द्रव्यों का ज्ञान हुआ, यह कैवल्य अवस्था की प्राप्ति के लिए साधक है । मुक्ति में कैवल्य अवस्था रहती है, केवल अकेलापन, प्योरिटी, एकाकिता की स्थिति का नाम मुक्ति है । तो जहाँ केवल बनना है तो वह केवल पदार्थ क्या है, इस प्रकार का बोध होना और वैसी प्रतीति होना और केवल निज के अनुरूप आचरण होना यह आवश्यक है । तो कैवल्य अवस्था की प्राप्ति के लिए पदार्थों का इस प्रकार बोध होना आवश्यक है कि जिस पद्धति में पदार्थ स्वचतुष्टय से रहित निरखने में आता रहे । तत्त्व का भी इस पद्धति से बोध हो सकता है । तत्त्वों के संबंध में आधार आधेय का भ्रम नहीं उत्पन्न होता । तत्त्व क्या है ? कोई परिणमन । उस परिणमन का आधार क्या है, किसकी परिणति है और वह परिणमन किस वस्तु का है, उपादान और निमित्त का क्या मिलकर परिणमन हैं, अथवा मात्र एक उपादान का ही परिणमन है ― इन सब निर्णयों के साथ तत्त्व का परिज्ञान होना और इस पद्धति से परिज्ञान होना कि वह परिणमन अपने स्त्रोतभूत पदार्थ से निर्गत हुआ है, यों निरखकर परिणमन को उपादानभूत पदार्थ में विलीन कर सके अर्थात्​ अपनी कल्पना में अपने वितर्क में पर्यायरूप तत्त्व का अभेद न रहे और अभेद पदार्थ उपयोगगत हो जाये और फिर वह भी सामान्य दृष्टि से कि जहाँ परद्रव्यों का भी विकल्प न रहे और स्व की अनुभूति का वातावरण बने, इस पद्धति से तत्त्व का जानना कैवल्य अवस्था की प्राप्ति में साधक है । यों ही पदार्थ और अस्तिकाय के संबंध में भी समझना चाहिए । तो जो पुरुष कैवल्य की उपासना करता है वही कैवल्य अवस्था को प्राप्त हो सकता है । कैवल्य की उपासना से मतलब शुद्ध आत्मा के केवलज्ञान की उपासना से भी है, और जब निज का परिज्ञान हो रहा हो या अन्य-अन्य पदार्थों का परिज्ञान हो रहा हो तो उसमें भी कैवल्य स्थिति क्या है, उसके परिज्ञान से भी प्रयोजन है । तात्पर्य यह है कि जो भूतार्थ पद्धति से द्रव्य तत्त्व पदार्थ और अस्तिकायों का श्रद्धान करता है उसे मुक्ति प्राप्त होती है ।


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