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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 440

From जैनकोष



अप्येकं दर्शनं श्र्लाघ्यं चरणज्ञानविच्युतम्​ ।न पुनम् संयमज्ञाने मिथ्यात्वविषदूषिते ॥440॥सम्यक्त्वशंसा ― चारित्र और विशिष्ट ज्ञान से च्युत हुआ भी सम्यग्दर्शन प्रशंसनीय कहलाता है और सम्यग्दर्शन के बिना चारित्र और ज्ञान मिथ्यात्व विष से दूषित होते हैं । सम्यग्दर्शन की महिमा कही जा रही है । किसी विशिष्ट कर्म के कारण ज्ञान का विस्तार और सम्यक्​चारित्र का अभाव भी हो तो भी सम्यग्दर्शन प्रशंसनीय है । अविरत सम्यग्दृष्टि के भी यद्यपि नियम नहीं है तो भी देव देवेंद्र तक उनको मानते हैं और सम्यग्दर्शन न हो, और बाह्यज्ञान आगमानुकूल भी हो और आगमानुकूल चारित्र, व्रत, तप की क्रिया भी की जा रही हो तब भी एक सम्यग्दर्शन के बिना वे सब मिथ्यात्व विष से दूषित कहलाते हैं । यदि कोई अंदाज से भी किसी को सम्यग्दृष्टि मान सके और पूजे तो भी सम्यग्दर्शन की ही पूजा है ।


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