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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 463

From जैनकोष



अज्ञानपूर्विका चेष्टा यतेर्यस्यात्र भूतले ।

स बध्नात्यात्मनामानं कुर्वन्नपि तपश्र्चिरम्​ ॥463॥अज्ञानपूर्वक चेष्टा में बंधनहेतुता ― जिस साधु की इस लोक में अज्ञानपूर्वक चेष्टा होती है वह चिरकाल भी तपस्या करता हो तब भी अपने आपसे अपने ही कृत्यों से बाँध लेता है । अज्ञानपूर्वक तप भी बंधन का ही कारण है । बात यों है कि जैसे किसी वस्तु पर चिकनाई हो तो धूल बँध जाती है । धूल न बँधे, इसका मूल उपाय तो चिकनाई रहित मूल वस्तु का होना है, तो रागद्वेष मोह आदिक जो विभाव हैं ये कर्मबंध के लिए चिकनाई का काम करते हैं, और यह चिकनाई न रहे, शुद्ध ज्ञान रहे तो बंध नहीं होता । कर्मबंध की बात तो दूर जाने दो, इसी समय बंधन न महसूस करें वह भी एक बड़ा भारी धार्मिक काम है । जहाँ शुद्ध ज्ञाता द्रष्टा रहने का परिणाम है वहाँ अधीनता और क्लेश नहीं रहते हैं । कोई मनुष्य ऐसा सोचे कि हम तो बड़े स्वाधीन हैं, घर में 2-4 प्राणी हैं, कोई लंबी गृहस्थी नहीं है, खूब आय भी है खर्च के लिए, किसी से कुछ वास्ता नहीं है, हम तो बड़े स्वतंत्र हैं, न किसी की नौकरी करते हैं, न कोई दुकान का झंझट है, हम तो बड़े आजाद हैं । लेकिन आजाद हैं कहाँ । चित्त में यह खोजो कि हमारा रागभाव चल रहा है या नहीं । घर में ही सही, परिजनों में रागांश चल रहा है या नहीं । थोड़ा व्यवहार में मान लो कि सब साधन हैं, बड़ी आजादी है लेकिन जिनके प्रति रागांश है उनके प्रति आप भीतर से परतंत्र हैं । और जब तक राग है तब तक कर्मों का बंध नहीं मिटता । तो जो राग किया जा रहा है वह व्यर्थ का राग है । मरने के बाद मिलता क्या है ? अथवा जब तक जीवन है तब तक भी किसी ने कुछ अच्छा कह दिया तो उससे क्या मिल गया ? अरे लोग क्या कहेंगे ऐसा जो संकोच बना है, जो लोगों से परिचय बना है वह भी एक राग का ही रूपक है और उससे खेद होता है ।

दु:ख के हेतु का निर्णय ― दु:ख के हेतु के निर्णय की एक ही बात है ― जब-जब भी खेद हो तब समझना चाहिए कि हमें किसी वस्तु का राग है उससे है खेद अन्यथा खेद कुछ नहीं है । संसार है, चक्र है, कुछ आता है, कुछ जाता है, कुछ घटता है, कुछ मिलता है, कोई अच्छा बोलता कोई बुरा बोलता, कोई आदर करता है, कोई घृणा करता है, ये तो संसार के कार्य हैं, इनसे मेरा सुधार बिगाड़ नहीं है । मैं ही उनमें विकल्प मचाऊँ तो बिगाड़ है । तो अज्ञानपूर्वक चेष्टा से यह जीव और तो बात दूर रहे ― तपस्या करके भी अपना ही बंधन बढ़ाता है और कहो किसी समय बहुत-बहुत तपश्चरण करे, कष्ट सहे और फिर भी कोई बड़ाई करने वाला न मिले तो कितना गुस्सा आता है ? अज्ञानपूर्वक जो भी आचरण होते हैं उनमें तो अंत में नियम से कष्ट है । किसी ने भला कह दिया उसमें राजी हो गए तो कष्ट है और निरंतर ही कोई बड़ाई करता रहे ऐसा तो है नहीं । तो जब कभी महसूस करने लगते हैं कि मेरी तो कुछ भी इज्जत नहीं हो रही, इतने-इतने दिन का उपवास करते हैं फिर भी कोई विशेष इज्जत नहीं होती यों कितनी ही आकुलताएँ मचती हैं । अज्ञानपूर्वक तप की बात कह रहे हैं । आजकल कितने ही अज्ञानपूर्वक तप हो रहे होंगे और कितने ही ज्ञानपूर्वक, यह तो निकट वाले ही जान सकते हैं । अथवा नहीं भी जान सकते हैं । वे तो जो करते हैं उसका फल उनके लिए है । लेकिन अज्ञान महान्​ क्लेशों का बीज है, बड़े-बड़े महल बन रहे, बड़े-बड़े ठाठबाट हैं । है क्या, आँखे मिचीं लो खत्म । वह जीव जो आगे जायेगा उसके लिए यहाँ का सब कुछ फिर क्या रहा ? कोई करोड़पति मरकर पड़ोस में ही किसी गरीब के यहाँ पैदा हो जाये तो उसके पहिले वाले ठाठबाट किसी काम आ रहे हैं ? उसके लिए तो वे सब गैर हैं । पर अज्ञान से पर को अपनाने का परिणाम यह घोर कष्ट की बात है अज्ञानी में ।


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