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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 468

From जैनकोष



यदिशुद्धे: परं धाम यद्योगिजनजीवितम्​ ।तद्वृत्तं सर्वसावद्यपर्युदासैकलक्षणम्​ ॥468॥

हितकारी ध्यान ― आत्मा का हितकारी ध्यान परिणमन है । यह जीव एक उपयोग को ही तो लगाता है अन्य कुछ तो करता नहीं । किसी भी प्रसंग में हो, चाहे संसार हालत में हो और चाहे मोक्षमार्ग में है वहाँ भी उपयोग लगाता है । मुक्त होने पर उसका सहज उपयोग परिणम जाता है । उपयोग का अर्थ क्या है, इसे सही दृष्टि से अगर देखो तो इसे इंग्लिश में यूज कहते हैं । आत्मा बेकार तो नहीं है, किसी न किसी यूज में है । तो जो भी इस प्रकार की चेष्टा है, वह परिणमन है । अब यहाँ छाँट लीजिए कि इस जीव का कैसा ध्यान बने कि संकट न रहे । अपने को ज्ञानस्वरूप निहारा जाय तो उस ध्यान में कोई संकट नहीं है, और जिस ध्यान में बाह्यपदार्थों का आकर्षण झुकान विकल्प चिंतन ख्याल रहता है वह ध्यानदु:खदायी बनता है ।

पर्यायमूलक संकोच ― इस आत्मा का किसी दूसरे से परिचय नहीं है, और यदि आत्मस्वरूप का परिचय हो जाय तो वह परिचय दुनियावी दृष्टि से अपरिचय के समान है, आत्मा में आत्मा का स्वरूप जो कि अमूर्त है, ज्ञानमात्र है, चैतन्यसामान्यस्वरूप है, परिचय मिल गया तो उस परिचय से आपकी क्या प्रतिष्ठा रही ? वह एक स्वरूप है तो व्यक्तिगत तो कोई बात नहीं उठी, और, व्यक्तिगत जब परिचय की बात रहती है तो असली परिचय नहीं हुआ, इस कारण जगत में किसी का संकोच करना किसी काम में यह तो अपराध की बात है, संकोच करके अपने को भयभीत बनाये रहना चाहे वह पापों से बचाने का भी कारण है संकोच, लेकिन संकोचरूप जो श्रद्धान है जीव का वह मिथ्यात्व का रूप है । भले ही अनेक प्रसंगों में ऐसा है कि संकोच की वजह से लोग पाप में न लगें, ठीक है, लेकिन जो मूल में संकोच पड़ा है, जिसकी वजह से कुछ व्यवहारिक आचरण ठीक चल रहा है उसके संकोच का तो स्वरूप बतावो कि मिथ्यात्व में आया है कि नहीं ?

आत्महित के लगाव बिना संकोच की मिथ्यारूपता ― आत्महित के लगाव से शुद्ध आचरण रखें, लोगों के डर की वजह से नहीं । मैं आत्मा हूँ, अकेला हूँ और यह तथ्य है कि हम पर जो गुजरता है उसका हमको ही फल भोगना होता है, कोई दूसरा सहाय नहीं है । जन्म मरण बहुत बड़ी विपदा है । जन्म मरण से छूटकर शुद्ध केवल रहना चाहिए, इसी में हमारा हित है । इस धुन के कारण आचरण ठीक बने वह तो मोक्षमार्ग के अनुकूल बात है और संकोच के कारण कभी बाह्य आचरण अच्छा भी करता और संकोच के ही कारण कभी खोटा पाप भी कर लेता है । जैसे लोक में हमारी इज्जत न रहेगी तो लोग क्या कहेंगे, हम अमुक वोट में जीत न सके फिर लोक में हमारी बड़ी हँसी होगी, उसके लिए कितने-कितने पाप करने पड़ते हैं तो वह भी तो संकोच का ही फल हुआ । तो संकोच में व्यवहारिक दृष्टि से अच्छे भी काम बनते हैं और बुरे भी, पर संकोच तो बुरा ही है । एक दूसरे की शर्म लाज करके संकोच करके जो भाव बना है वह भाव एक मोह की ओर ले जाने वाला है ।मेरा हित हो इस दृष्टि से करिये आचरण । दूसरों को दिखाने के लिए, दूसरों में भला जँचने के लिए, दूसरों में नामवरी रखने के लिए जो कार्य किया जाय वह तो मूल में ही पापरूप है । इस जीव का कार्य उपयोग का लगना है । यह उपयोग किस ओर लगे? निज की ओर यह उपयोग लगे तो यह है सम्यक्​चारित्र और यह उपयोग किसी दूसरी ओर लगे उसका नाम है मिथ्याचारित्र । तो यह सब सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान पर निर्भर है । मिथ्याविश्वास और मिथ्याज्ञानसहित जो उपयोग का लगाव है वह है मिथ्याचारित्र । और, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञानसहित जो लगाव है वह है सम्यक्​चारित्र । जो विशुद्धि का उत्कृष्ट साधन है, जो योगीश्वरों का जीवन है, समस्त प्रकार की पापप्रवृत्तियों से दूर रहने का जो लक्षण है उसी का नाम सम्यक्​चारित्र है ।

रत्नत्रय के लगाव में हितपना ― ध्यान के प्रसंग में मुख्य तो ये तीन हैं ― सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्​चारित्र । चारित्र विशुद्ध रहेगा तो आत्मा का ध्यान भी विशुद्ध बनेगा । ध्यान के विशुद्ध होने में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान की भाँति सम्यक्​चारित्र का भी स्थान है । यह चारित्र सब पापों से निवृत्त कराता है । यह चारित्र ही दर्शन को शुद्ध कराता है, सम्यग्दर्शन होने के बाद सम्यक्​चारित्र होता है, तो सम्यक्​चारित्र से दर्शन की भी निर्मलता बढ़ती है ।रत्नत्रय का ध्यान ही कल्याणप्रद ― मुनिजनों का तो यही समस्त जीवन है, अहिंसामय जीवन । अहिंसामय जीवन का अर्थ केवल इतना न लगाना कि बाहर में चींटा चींटी आदि की हिंसा न करें, और पिछी रखते हैं उससे जीवों की हिंसा का बचाव करते हैं, इतना ही अहिंसा का अर्थ नहीं है । अहिंसा का विशुद्ध अर्थ है अपने आपको निर्दोष सहजस्वरूप निरखकर रागद्वेष विकल्पों का परित्याग करना और अपने आत्मप्रभु की हिंसा न होने देना । तो अहिंसा तो मुनिजनों का जीवन सर्वस्व है । अहिंसा के बिना तो मुनिपदवी हो ही नहीं सकती । अहिंसा ही सम्यक्चारित्र है । पाप भी एक ही है ― हिंसा । अपने स्वरूप से चिगकर अपने आपको विह्वल बनाना, संसार में रुलना यह है हिंसा ।अहिंसा बिना मुनिधर्म नहीं ― अब यह हिंसा कोई तो जीवघात के कार्य के माध्यम से होती है, कोई झूठ बोलने से, कोर्इ चोरी करने से, कभी कुशील करने से और कोई परिग्रह से होती है पर है सब में हिंसा । कोई कहे कि परिग्रह रखना क्यों पाप हुआ? तो परिग्रह रखना यों पाप हुआ कि परिग्रह में जो मूर्छा हुई, जीव ने अपने आत्मा के ज्ञानदर्शन प्राणों का घात किया, यह अपराध हुआ परिग्रह में, अन्यथा परिग्रह में अपराध क्या ?पड़ा है, मकान मकान की जगह है, वैभव वैभव की जगह है, पर अपराध तो आत्महिंसा का है । तो पाप भी एक है ― हिंसा, और निष्पाप भी एक है ― अहिंसा । तो सम्यग्दर्शन कहो, अहिंसा कहो, उसके बिना मुनिपदवी होती ही नहीं है । और, यह सम्यक्​चारित्र ध्याता के ध्यान की विशुद्धि का करने वाला है । इस अध्याय में सम्यक्​चारित्र का वर्णन चलेगा, और सम्यक्​चारित्र में सर्वप्रथम अहिंसा का वर्णन है ।



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