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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 470

From जैनकोष



पंचमहाव्रतमूलं समितिप्रसरं नितांतमनवद्यम्​ ।गुप्तिफलभारनम्रं सन्मतिना कीर्तितं वृत्तम्​ ॥470॥

संयमवृक्ष ― वहीं चारित्र सन्मतिनाथ ने 13 प्रकार का कहा है ― 5 महाव्रत, 5 समिति और 3 गुप्ति । मानो यह चारित्र एक वृक्ष है । और उस चारित्रवृक्ष की जड़ तो 5 महाव्रत है और चारित्रवृक्ष का जो फैलाव है वह सामायिक है और चारित्रवृक्ष में जो फल लगते हैं वे गुप्तियां हैं । जैसे मूल के बिना वृक्ष टिक नहीं सकता । जड़ पुष्ट हो तो वृक्ष भी खड़ा रहे, ऐसे ही सम्यक्​चारित्र की जड़ है 5 महाव्रत ― अहिंसामहाव्रत, सत्यमहाव्रत, अचौर्यमहाव्रत, ब्रह्मचर्यमहाव्रत, परिग्रहत्यागमहाव्रत । इन महाव्रतों के आधार पर संयमवृक्ष टिका हुआ है । मूल नहीं है तो वृक्ष कहाँ, शाखायें कहाँ? कोई पुरुष समिति का पालन करे और अंतरंग में 5 महाव्रतों के धारण न हो तो वहाँ संयम कहाँ जगा? संयमवृक्ष की जड़ है 5 महाव्रत और उस चारित्र का प्रसार नजर आयेगा समितियों में, लेकिन समितियों की परीक्षा से ही तो मुनि की परीक्षा करते हैं । कोर्इ मुनि ऊँचा सिर करके जहाँ चाहे चलता हो तो लोग कहेंगे कि इसने ईयासमिति नहीं पाला, यह मुनि नहीं है । कोई मुनि बुरे वचन बोलता हो अहितकारी वचन बोलता हो तो लोग उसकी परीक्षा करते हैं कि यह मुनि नहीं है । मुनि के वचन तो इतना शीतल होने चाहिए कि अनेक झंझटों से दु:खी हुआ कोई पुरुष मुनि के निकट बैठ जाय तो उस पुरुष के सारे दु:ख उस मुनि के वचन सुनने से दूर हो जाते हैं । इतने हित, मित, प्रिय वचन मुनि के होने चाहिए और न हों तो परीक्षा हो गयी कि मुनि धर्म नहीं है, इसके पास भाषासमिति नहीं रही। इस प्रकार एषणासमिति से परीक्षा की जाती है। जैसा चाहे बनवाकर खा लिया, अपने भाई को रख लिया, बेटे को रख लिया, भोजनादिक का सब प्रबंध हो रहा है, संचय कर रहे हैं, सब खर्च चल रहे हैं, ऐसी बातें देखकर लोग परीक्षा करते हैं कि यह मुनि नहीं है । ऐसे ही ब्रह्मचर्यमहाव्रत है । अकेले रहते हों, स्त्री साथ रखे हों, चाहे उसे ब्रह्मचारिणी बनाकर रखें, चाहे किसी ढंग से रखें तो लोग परीक्षा कर लेते हैं कि यह मुनित्व नहीं है । इसी प्रकार अपने आराम के लिए बहुत-बहुत सवारियां रखे, बड़ा खटपट रखे तो लोग परीक्षा कर लेते हैं कि यह मुनित्व नहीं है । तो जैसे वृक्ष के प्रसार से डालियों का फैलाव चलता इसी प्रकार समितियों के प्रसार से संयम का फैलाव चलता है। संयम में समितियों का प्रसार है और उस संयमवृक्ष में फल क्या मिला? जो संयम की आखिरी चीज है वह है गुप्ति ।

संयम वृक्ष का फल गुप्ति ― मन वश में हो, वचन वश में हो और काय वश में हो तो यह संयम का एक उत्कृष्ट फल है । किसलिए संयम किया जा रहा है कि यह मन वश हो जाय, मन की तरंग समाप्त हो जाय । वचन अंतर्जल्प हों, भीतर में गुनगुनाहट तक न उठे, शरीर निश्चल रहे और ऐसी स्थिति में विशुद्ध सहजस्वरूप का ध्यान जगता है । यही तो संयम का फल है । चारित्र 13 प्रकार का है और इस चारित्र की यहाँ वृक्ष की उपमा दी है । तो चारित्र की जड़ तो है महाव्रत और फल है गुप्ति । और 5 समितियों का जो धारण पालन है यही चारित्र का प्रसार है । जो भव्य आत्मा इस जीवन से रहते हैं उनको ध्यान के लिए बहुत सहयोग मिलता है ।ध्यानसिद्धि सम्यक्​चारित्र से ही संभव ― कोई पुरुष पाप करता रहता हो तो उसका चित्त स्थिर नहीं रह पाता । और, स्थिर जीवन हो तो उसके चित्त में मजबूती रहती है और निराकुलता आनंद सभी बातें उसे प्राप्त होती हैं, और, पापिष्ठ जीवन में न तो शुद्ध आनंद जगता है, न प्रसन्नता रहती है । जीवन एक भार सा मालूम होता है । तो पापों की जहाँ अत्यंत निवृत्ति है, शुद्ध चारित्र है तो उस चारित्र की परिस्थिति में योगीश्वरों को ऐसा ध्यान जगता है कि जैसे स्पष्ट आनंद का प्रवाह चल रहा है तो चल ही रहा है ऐसे ही धर्म का प्रवेश चल रहा है तो चलता ही जा रहा है । तो सम्यक्​चारित्र ध्यान की सिद्धि के लिए एक उत्कृष्ट अंग माना गया है ।


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