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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 476

From जैनकोष



मृते वा जीविते वा स्याज्जंतुजाते प्रमादिनाम्​ ।बंध एव न बंध: स्याद्धिसाया: संवृतात्मनाम्​ ॥476॥

प्रमादी व अज्ञानी को निरंतर हिंसा का बंध ― अज्ञानी अथवा प्रमादी पुरुषों को तो निरंतर हिंसा का ही बंध होता रहता है । जिस पुरुष के चित्त में शिकार खेलने का परिणाम है, बंदूक लेकर वन में पक्षियों को, पशुवों को देख रहा है और किसी दिन उसे एक भी शिकार न मिले तो उसे निर्दोष न कहा जायेगा, आज इसने किसी की हिंसा नहीं की । ऐसा यद्यपि लोग देखते हैं लेकिन वह अहिंसक न होगा । उसके तो परिणाम में निरंतर हिंसा ही भरी रहती है । इसके लिए बिलाव का दृष्टांत बहुत प्रसिद्ध है । उसके चलने से, दृष्टि से यह बात जाहिर है कि बिलाव के निरंतर मन में रहता है कि मुझे खूब चूहे मिलें, और यदि बिलाव सोता हो तो शायद उसके मन में यही रहता होगा कि मुझे चूहे मिलें । तो जिसका निरंतर शिकार में परिणाम रहता है वह निर्दोष कैसे कहा जा सकता है ॽ यों ही प्रमादी पुरुष को जीव मरें अथवा नहीं निरंतर हिंसा का बंध होता रहता है ।

कर्मबंधन में प्रधान कारण आत्मा का परिणाम ― और जो संवर सहित हैं, अंतरात्मा हैं, अप्रमादी हैं, बड़ी विधिपूर्वक दया के भाव से शोध कर चल रहे हैं कदाचित कोई छोटा जीव पग तले आकर मर जाय तो परिणामों से देखिये उसके हिंसा का बंध नहीं होता । कर्मबंध होने में प्रधान कारण आत्मा का परिणाम है । जो पुरुष प्रमाद सहित हैं वे यत्नपूर्वक भी चलते हैं तो उनको जीव मरे अथवा न मरे मगर बंध होता ही है । जो निष्प्रमाद हैं, जिनकी यत्नपूर्वक वृत्ति है, दैवयोग से कदाचित कोई जीव मर भी जाय तो भी कर्मबंध नहीं होता, मालूम पड़ जाय कि जीव मर गया तो वे खेद करते हैं और प्रायश्चित कर लेते हैं । प्रत्येक दशावों में परिणाम उच्च रखना, धीर रखना, क्षमाशील रखना यह लाभदायक है । साधु हो अथवा गृहस्थ दोनों को यदि प्रमाद है तो वे एक से हैं । जो सम्यग्ज्ञानी होते हैं उनका निर्णय एक समान रहता है ।

समस्त आत्मज्ञानियों को वृत्ति में समानपना― जिन-जिन पुरुषों को आत्मानुभव हुआ है उन सब पुरुषों को आत्मानुभव एक समान हुआ है, ऐसे ही उनकी चर्या भी एक पद्धति को लिए हुए है । लक्ष्य एक ही है, हमसे पापरूप वृत्ति न हो, और हम इस काबिल बने रहें कि अपने आत्मस्वभाव के अधिकाधिक दर्शन करते रहें और अपने स्वरूप में मग्न रह सकें, परपदार्थों की दृष्टि में हमारा उपयोग न फँसे और मैं अधिकाधिक ज्ञान दर्शन स्वरूप निज प्रकाश में ही मग्न रहा करूँ, ऐसी ही उनकी धारणा रहती है ऐसे पुरुष अहिंसक होते हैं और वे ध्यान में अपनी कदम बढ़ा सकते हैं । शुद्ध ध्यान बिना आत्मा संसार से पार नहीं हो सकता । और शुद्ध ध्यान तभी बन सकता है जब हमारा निर्णय तो शुद्ध हो । मैं केवल एक चैतन्यस्वरूपमात्र हूँ । लो जहाँ गया उतना ही गया, जहाँ जायेगा उतना ही जायेगा । जो मेरा है वह मेरे से छूटता नहीं, जो मेरा नहीं है वह मुझमें आता ही नहीं है । अज्ञानी जीव कल्पना से कितने ही लोगों को अपने चित्त में बसा लेता है । तो केवल उसकी कल्पना की बात है । जो आत्मा का तत्त्व नहीं वह आत्मा में कभी आ नहीं सकता । जो आत्मा का तत्त्व है वह आत्मा से कभी बिछुड़ नहीं सकता । इस बात से जब स्वभाव आत्मतत्त्व है, चैतन्यस्वरूप अंतस्तत्त्व है ऐसा सोचकर तो वहाँ यह नजर आयेगा, तो इस मुझमें क्रोधादिक विभाव भी नहीं आ रहे हैं। क्रोधादिक विभाव यदि स्वभाव के रूप से आ जायें तो उसका स्वरूप ही मिट जायेगा ।

निर्दोष प्रवृत्तिवान के दो कर्मक्षय व मुक्ति ― मैं सबसे विविक्त शुद्धचैतन्यस्वरूप हूँ । ऐसा जिनका दृढ़ निर्णय है वे पुरुष धीर, गंभीर, उदार और निराकुल रह सकते हैं । निर्णय हमारा सत्य रहना चाहिए । परिस्थिति कुछ भी गुजरे लेकिन निर्णय में हमारी भूल न रहना चाहिए । निर्णय में भूल हुई तो हम सुखी कभी नहीं रह सकते । जिनका निर्णय पवित्र है और जिनकी प्रवृत्ति भी निर्दोष है ऐसे संत पुरुष ही आत्मा का ध्यान करके समस्त कर्मों का क्षय करके मुक्ति प्राप्त करते हैं ।


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