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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 481

From जैनकोष



क्षमादिपरमोदारैर्यमैर्यो वर्द्धितश्चिरम्​ ।

हन्यते स क्षणादेव हिंसया धर्मपादप: ॥481॥

हिंसा से धर्मवृक्ष का नाश ― जो धर्मरूपी वृक्ष उत्तम क्षमा बड़े उदार नियम संयम से बहुत काल में वृध्यंगत्​ किया है वह धर्मरूपी वृक्ष इस हिंसारूपी कुठार से लक्षणमात्र में नष्ट हो जाता है । जहाँ हिंसा होती है वहाँ धर्म का लेश भी नहीं है, अब इस बात को व्यवहार में भी घटा लो और परमार्थ में भी घटा लो । जिस धर्म को बहुत प्रयत्नों से बढ़ाया गया है और किसी क्षण मूर्छा विकार कठिन उत्पन्न हो जाय तो वहाँ धर्मवृक्ष क्षणमात्र में नष्ट हो जाता है ॽ व्यवहार में भी देख लो ― कड़े नियम संयम से जो जीवन व्यतीत किया है और धर्ममय जीवन किया है कभी संकल्पवश किसी जीव का विघात कर दिया जाय तो सारा कमाया हुआ धर्मवृक्ष क्षणमात्र में नष्ट हो जाता है । जीव के साथ कर्मों की उपाधि लगी है और कब किस भाव से कर्म बंधे थे उनमें से कैसे कर्म उदय में आ रहे हैं उनका जब प्राबल्य होता है तो फिर इस जीव में न्यूनता आती है । ऐसे प्रसंग अनेक बार होते हैं । उन प्रसंगों में भी अपने को संभालना यह बड़ा भारी पुरुषार्थ है । और एक कठिन बात यह भी है कि जैसे आज कर्मबंध किया और आगे मान लो 10 हजार वर्ष तक के और कर्म बाँधे, मान लो 10 करोड़ परमाणुवों का वर्गणावों का तो कुछ समय बाद उसकी उदय रचना बन जायेगा और वह रचना इस तरह बन जायगी कि मान लो दो दिन तक तो उदय में न आये और दो दिन कम 10 हजार वर्ष तक उदय में आता रहेगा तो पहिले बहुत वर्गणाएँ उदय में आयेंगी, उसके बाद कम-कम वर्गणाएँ उदय में आयेंगी । और अंतिम 10 हजार वर्ष जब समय होगा उस समय बहुत कम कर्म वर्गणाएँ उदय में रह जायेंगी, लेकिन जब ज्यादा वर्गणाएँ उदय में आरंभ में हैं तो जीवों को फल कम भोगना पड़ता है । और जैसे-जैसे अंत में कम वर्गणाएँ रह जाती हैं वैसे ही वैसे फल विकट होता जाता है, ऐसी प्रकृति है कर्मों में । तो इस तरह इस ओर दृष्टि देना है कि हमारे पहिले तो कर्मबंध होंगे उनमें बहुत से खिर गए, मगर जो रह गए वे यद्यपि संख्या में तो थोड़े हैं मगर फल देने में विकट हैं और ऐसे समय में बड़ी-बड़ी साधना करना पड़ता है और कभी ऐसा उदय आ जाय और उसका निमित्त पाकर यह जीव फिसले तो ऐसा फिसल सकता है कि फिर सागरों पर्यंत संसार में चक्र लगाये । सदा ज्ञानी विरक्त पुरुषों का सत्संग मिले तो यह बहुत बड़ी भारी विभूति है ।

ज्ञान की सावधानी में संपूर्ण समृद्धि ― ज्ञान की संभाल ज्ञान की सावधानी में सब समृद्धियाँ भरी हैं और एक ज्ञान की संभाल नहीं है तो करोड़ों का भी वैभव आये तो भी आनंद और प्रसन्नता तो उसके नहीं सह सकती । जिस विधि से ज्ञान की संभाल रहे वह विधि बने, उससे बढ़कर सौभाग्य और कुछ नहीं है । जब हम स्वाध्याय करते हैं वह भी एक सत्संग का रूप है । अकेले ही पढ़ रहे हैं मगर जिनकी कृति हम पढ़ रहे हैं उनका संग है । शरीर का संग नहीं रहा, किंतु उनकी यह वाणी है और उनका जो हृदय का भाव है यह सब इसमें से हम जान लेते हैं । तो हम उनका ही संग करते रहें । जैसे जब कभी किसी स्वर्गवासी पुरुष की चर्चा करें और वह चर्चा दिल से गहरी हो जाय तो उस पुरुष से मिलन जैसा हो जाता है । तो स्वाध्याय में भी सत्संग बसा हुआ है । तो यह धर्मवृक्ष जो बड़े उद्यम से अब तक संभाला गया, बढ़ाया गया वह धर्मवृक्ष हिंसारूप कुठार से क्षणमात्र में नष्ट हो जाता है । जहाँ हिंसा होती है वहाँ धर्म का लेश भी नहीं होता ।


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