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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 506

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भयवेपितसर्वांगाननाथान्​ जीवितप्रियान्​ ।निघ्नभ्दि: प्राणिन: किं तै: स्वं ज्ञातमजरामरं ॥506॥

परहिंसा से स्वहिंसा गर्भित ― ये हिंसक लोग जो कि ऐसे प्राणियों को मारते हैं जो निरपराध हैं, जिनको जीना एक प्रियवस्तु है, जो अनाथ हैं, जिनका कोई रक्षक नहीं है, भय से जिनके सारे अंग काँप रहे हैं ऐसे प्राणियों को जो मारते हैं उन्होंने क्या अपने को अजर अमर समझ रखा है ॽ मुझे भी कोई मार देगा इसका कुछ ख्याल नहीं करता यह हिंसक जीव । भला सोचिये तो वह घटना ― कोई पुरुष किसी पशु को अथवा मनुष्य को बाँधकर शस्त्र से मारता है, जिसके अंग भय से काँप रहे हैं, जिनकी रक्षा का कोई उपाय नहीं, अनाथ हैं, जिनका कोई स्वामी नहीं । जीवन तो सबको प्रिय है ना । ऐसे प्राणियों को जो मारता है समझिये कितने क्रूर कर्म करता है । उन्होंने क्या अपने को अजर अमर समझ रखा है ॽ वे भी इसी प्रकार दूसरों के द्वारा मारे जायेंगे, सताये जायेंगे । इस दृष्टि को मुख्य करके न देखिये किंतु हिंसा का परिणाम होने पर खुद अंधेरे में हो गया, खुद बेसुध हो गया, बेकार बना, मिथ्यात्व का कीचड़ और घनिष्ट लगा, संसार में जन्म मरण करता रहेगा, आत्मीय शुद्ध आनंद से दूर हो जायगा, इस कारण हे कल्याणार्थी पुरुष ! अपने आपको अहिंसक बनाओ । अहिंसा से अपना जीवन भरा हुआ है ।

बाह्य समागम का कारण पुण्योदय ― किसी के साथ छल कपट करके, दगाबाजी करके कौन सी ऋद्धि लूट ली जायगी ॽ अरे ये पौद्गलिक ठाठ ही तो हैं । इनसे आत्मा का क्या संबंध है । ये घर में अधिक आ गए तो क्या, कम रह गए तो क्या? और, फिर छल कपट से धन नहीं बढ़ता, यह तो धर्म से पुण्योदय से अपने आप बढ़ता है । यह बात बिल्कुल सत्य है । कोई जीव किसी सेठ के घर उत्पन्न हो गया तो क्या कमाया उसने ॽ करोड़पति कहलाने लगा । कोई जीव मरकर इंद्र बन गया, क्या उसने वहाँ कमाया ॽ पर अटूट वैभव का स्वामी बन गया । ये धन वैभव पुण्योदय से आते हैं, इनके प्रति विकल्प रखना अच्छा नहीं है, इतनी हिम्मत हो कि लक्ष्मी को आना हो, इसकी जितनी अटकी हो उतनी आये, न आना हो, न अटकी हो मत आये, मुझे कोई इससे हानि नहीं है । मेरा धर्म, मेरा ज्ञान, मेरा सम्यक्त्व मेरे पास है तो फिर और किस वस्तु की जरूरत है ।धर्ममय जीवन में ही कल्याण ― जब यह आत्मा अकेला है, स्वतंत्र है स्वयं के स्वरूप है, फिर इसको अन्य वस्तु के समागम की क्यों अटक है ॽ स्वयं अपने आप जैसा संयोग समागम जो कुछ होता हो हो हम तो एक धर्म के लिए मनुष्य हुए हैं, ऐसा चित्त में निर्णय होना चाहिए और धर्मपालन भी शुद्ध चैतन्यस्वरूप के दर्शन से होता है । और जिसने शुद्ध चैतन्यस्वरूप का दर्शन किया है, सम्यक्त्व जगा है उसका सब जीवों के प्रति उसी प्रकार का आदर होगा जैसा शुद्ध चैतन्यस्वरूप की दृष्टि से बनता है । बहुत अपूर्व अवसर है यह । जो ऐसी बुद्धि बल सहित नरभव मिला है किसमें बुद्धि नहीं है ॽ घर की व्यवस्था करते, धन की व्यवस्था करते, व्यापार की व्यवस्था करते और बड़ी-बड़ी समस्यायें सुल्झाते, बहुत-बहुत युक्तियों का आधिपत्य मिला है, क्षयोपशम तो खूब है, अब इस अपूर्व अवसर का हम ऐसा सदुपयोग करें कि हम इस मायामय संसार में न उलझकर वास्तविक कल्याण में लग जायें ।

मायामयी दुनिया ― क्या है, ये दुनिया के लोग हमें गरीबी के कारण कुछ न समझेंगे मत समझें, यह दुनिया ही मायामय है, ये सब पुरुष भी मायामय है, सब कर्मों से कलंकित हैं, दु:ख से मलीमस हैं । किनमें अपना नाम बढ़वाना चाहते हो ॽ किनमें अपना कुछ यश चाहते हो ॽ यह तो पूरी मूढ़ता है । तत्त्व क्या है इसमें ॽ कोई भी मनुष्य मेरा कुछ भी नाम न ले, कुछ भी इज्जत न करे, गरीब जानकर उपेक्षा कर दे तो कर दे, हम यदि अपनी उपेक्षा कर जायें तो हमारा बिगाड़ है । हम अपने में ईमानदार रहते हैं, अहिंसक रहते हैं, सरल रहते हैं, उदार रहते हैं, अपने यथार्थज्ञान सही बनाये रहते हैं तो हमारा कुछ बिगाड़ नहीं है । लोग कुछ भी करें, अपनी संभाल है तो भला है, लोगों से क्या चाहते हो ॽ ऐसा अपना आत्मबल बढ़े और अपने धर्म के पालन के लिए यत्न रहे इससे तो जीवन की सफलता है । धन जोड़ लेने में कुछ तत्त्व नहीं रखा है । खूब निहार लो, आता है पुण्य के उदय से तो आये, उसका उपयोग करें, पर उसकी आशा करना, प्रयत्न करना कि लोग मुझे यह जान जायेंगे कि यह भी बड़े आदमी हैं इस दृष्टि से संचय करना तो महामूढ़ता की बात है । पर्याय व्यामोह है तभी तो यों सोचते हैं कि लोग मुझे कुछ अच्छा कह दें । कौन से लोग ॽ अज्ञानी लोग । ज्ञानी तो इस कारण अच्छा कहेंगे नहीं । तो ज्ञानी जनों को कुछ अपना नाम अथवा कुछ प्रशंसा के शब्द कहलवाने मात्र के लिए रात दिन तृष्णा से अपने जीवन को फूबर बनाये रहना यह कोई बुद्धिमानी नहीं है । आत्मदया करो ।

अपनी एकत्व निरख से शांति ― जितना अधिक अपने आपको अकेला निरख सकोगे उतनी अधिक शांति मिलेगी, मोक्षमार्ग मिलेगा, भविष्य सुधरेगा । यह मैं देह तक से भी न्यारा, औपाधिक परभावों से भी न्यारा केवल ज्ञानस्वरूप हूँ, ऐसा अपने आपको अकेला निहारते जाइये । जितना अपने आपको अकेला निरखोगे उतना ही धर्ममार्ग में कदम बढ़ेगा, उतनी ही शांति मिलेगी । और यही है वास्तविक अहिंसा । जो पुरुष ऐसे अहिंसक होते हैं उनको उत्तम आत्मध्यान की सिद्धि होगी ।


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