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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 516

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जन्मोग्रभयभीतानामहिंसैवौषधि: परा ।तथाऽमरपुरीं गंतुं पाथेयं पथि पुष्कलम्​ ॥516॥

विकारपरिणमन कष्टकर ― यह संसार एक महान्​ कष्ट है । संसार नाम है जो आत्मा में कल्पनाएँ उठ रही हैं उस परिणाम का । हमारी दुनिया बाहर नहीं है । हमारे भीतर ही जो हमारा विकारपरिणमन चल रहा है वह हमारी दुनिया है । तो ये भावसंसार ये अन्य-अन्य पदार्थों के विकल्प ख्याल चिंता लगाव ये सब विकार महान्​ कष्ट हैं । जिस कष्ट में बैचेन रहते हैं मोही प्राणी और उस बेचैनी को दूर करने के लिए वही कष्ट किया करते हैं । कष्ट से उत्पन्न हुए कष्ट को मिटाने के लिए उस ही कष्ट में रहा करते हैं ।

ज्ञानोपयोगमय स्थिति में संकटों से छुटकारा ― यह संसार एक तीव्र कष्टरूप है । उससे जो भयभीत हुए हैं जिन्हें ये काल्पनिक कष्ट न चाहिये, जिन्हें यह सांसारिक परंपरा न चाहिए उन जीवों के लिए औषधि आचार्य देव ने एक अहिंसा ही बताया है । जैसे किसी नदी में कोई कछुवा अपना सिर उठाकर तैर रहा हो उसकी चोंच पर बींसो पक्षी आते हैं, चोंच को पकड़ना चाहते हैं तो वह कछुवा संकट में पड़ जाता है, मगर काहे का संकट ? अरे कछुवा के पास एक ऐसी कला है कि चार अंगुल अपनी चोंच पानी में डुबो दे, सारे संकट एक साथ समाप्त हो जाते हैं । यहाँ वहाँ चोंच कर करके बचने का कष्ट क्यों करे कछुवा ॽ सीधा पानी में डूब जाय । फिर वे पक्षी क्या करेंगे ? ऐसे ही समझिये कि हम आप जीवों ने अपनी चोंच, अपना उपयोग इस ज्ञानसमुद्र से बाहर निकाल रखा है । हम अपने ज्ञानसमुद्र में थे, ज्ञानमय होकर भी हम अपने ज्ञान से हटकर इन अज्ञानमय जड़ पदार्थों की ओर अपना उपयोग निकाले हुए हैं तो हम आप पर विपदायें आ गईं । कोई एक संकट है क्या ॽ अरबों आदमी होंगे । उन अरबों आदमियों में अरबों प्रकार के संकट हैं । किसी का संकट किसी दूसरे के संकटों से मिलता जुलता भी नहीं है । थोड़ा मिल जायेगा, यों तो सभी मिलते हैं क्योंकि संकट है मोह, राग, द्वेष यों तो मिल ही गए, मगर उसके विशेष विश्लेषण में जायें तो सबके संकट न्यारे हैं । इतने प्रकार के संकट इस जीव पर मंडरा रहे है । अब यह मोही जीव उन बाहरी संकटों से घबड़ाकर बाहर में ही उपयोग का अदलबदल करता रहता है, मगर उस अदलबदल करने से क्या लाभ ॽ संकट मिटेंगे नहीं ।

हितकारी उपयोग की शिक्षा ― हे आत्मन्​ ! तुझमें तो एक ऐसी सहज कला है कि थोड़ा अंदर तो आ । उपयोग को तूने अपने ज्ञानस्वरूप से बाहर निकाल रखा है, बाहरी पदार्थों की ओर तूने अपनी यह ज्ञानदृष्टि बना रखी है उसको भीतर करले । अपने आपको ज्ञानमात्र अनुभव कर । मैं केवल ज्ञानस्वरूप हूँ, मेरा कहीं कुछ बिगाड़ नहीं है । कोई कुछ कहता हो, कोई कुछ करता हो, वह उनकी जगह है काम । मैं ज्ञानस्वरूप हूँ, ऐसा ज्ञानमात्र अपने आपमें अपने उपयोग को जरा डुबा तो सही ― मग्न तो कर, फिर देख ले कि सारे संकट एक साथ टलते हैं या नहीं । इस संसाररूपी तीव्र भय से भयभीत होने वाले जीवों को यह आत्मपरिणति शरण है । यही है परमअहिंसा, परमब्रह्म की उपासना परमअहिंसा है क्योंकि यह आत्ममग्नता ही सर्वप्रकार के भयों को दूर करता है, और इस आत्मपरिणति से जो अपनी वृत्ति रखता है अर्थात्​ ऐसी अहिंसावृत्ति बनाता है तो समझिये कि यह अहिंसा ही स्वर्ग जाने के लिए, सुगति पाने के लिए एक पाथेय जेब खर्च है । जैसे किसी के पास जेब खर्च हो, भोजन हो, कलेवा हो तो गंतव्य मार्ग को बहुत सुगमता से पार कर लेता है ऐसे ही जिसकी अहिंसावृत्ति हो तो वह स्वर्ग मोक्ष जैसे कल्याण की चीज पर अपना अधिकार शीघ्र जमा लेता है, सद्​गति का पात्र होता है । अहिंसामय जीवन हो ।


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