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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 519

From जैनकोष



अभयं यच्छ भूतेषु कुरु मैत्रीमनिंदिताम्​ ।पश्यात्मसदृशं विश्र्वं जीवलोके चराचरम्​ ॥519॥

अभयदान की प्रेरणा ― हे भव्य जीव, तू संसार के प्राणियों को अभयदान दे, ऐसा संकल्प कर कि सभी प्राणी निर्भयतापूर्वक रहें और सत्य पथ पर चलें । चाहे पड़ोस के लोग जिस किसी को शत्रु मानते हों, देश के लोग जिस किसी को बैरी समझते हों समझें परंतु ज्ञानी पुरुष जब हितभावना में चल रहा है तो उस जगह के सब प्राणियों का भला सोचते हैं ।

खोटे आशय से बैरी की कल्पना ― विरोधी है कौन ॽ जो आज विरोधी हैं उसका आशय यदि शुद्ध बन जाय और वह हमारे प्रति द्वेषभाव न रखे तो बैरी कहाँ रहा ॽ बैरी जीव का नाम नहीं है बैरी तो एक पर्याय है, दुराशय है । खोटा आशय मिट जाय तो बैरी क्या चीज है और वैसे भी कोई मेरा बैरी नहीं है । जो बैरी बने हुए हैं वे अपने स्वार्थ के कारण अपनी आशक्ति और लिप्सा के कारण कुछ से कुछ चाहते हैं इसीलिए वे नाना यत्न करते हैं, पर मुझसे बैर भजाने के लिए, मुझे मूलत: बरबाद करने के लिए उनकी चेष्टा नहीं है । उनकी चेष्टा अपने आपकी पर्याय के उत्थान के लिए है । यों भी कोई जीव बैरी नहीं है । और, जो पुरुष किसी भी प्राणी को अपना बैरी समझता होगा उसमें वही अंधकार पड़ा है, वह अज्ञान का आवरण है । जिसकी ओट में आत्मा ढका है वह दृष्टि में नहीं आता । जो अपने आपमें बसे हुए कारणसमयसार परमात्मतत्त्व का निर्णय रख रहा है उसके लिए जगत में कोई जीव बैरी नहीं है । हे भव्य जीव तू समस्त जीवों को अभयदान दे, सब मुझसे निर्भय रहें, कोई मुझसे डरे नहीं । लोग मुझसे कब डरेंगे जब मेरा आचरण विपरीत हो अन्याय पर हम उतारू हो जायें तो लोग हमसे भय करेंगे ।

विशुद्ध श्रद्धान, ज्ञान, आचरण से निर्भयता ― यदि कुछ बल है अपना श्रद्धान, ज्ञान, आचरण विशुद्ध है तो लोग हमसे निर्भय हो सकते हैं । जैसे बाह्य भेष में दिगंबर मुनि का भेष एक निर्भयता का भेष है, वह स्वयं निर्भय है, जो शरीरमात्र रह गया वह तो निर्भय है ही । भय होता है परिग्रह के कारण, जब साथ में कुछ परिग्रह लगा हो तो भय बने । तो निष्परिग्रहता होने से वे मुनि खुद निर्भय हैं और फिर उनके पास परिग्रह वगैरह कुछ नहीं है तो दूसरे लोग भी निर्भय रहते हैं । जिस सन्यासी के पास त्रिशूल है, चिमटा है उससे तो लोग बात करने में डरेंगे । जैसे जिसके पास बंदूक है, लाइसेंस सुदा है, किसी को मार नहीं सकता, बंदूक चला नहीं सकता लेकिन कभी क्रोध विशेष आ जाय तो फिर लाइसेंस और कानून की किसे याद रहती है ? वह तो बंदूक चला सकता है । ऐसे ही किसी सन्यासी का विडरूप हो तो उससे सभी लोग डरते हैं कि न जाने मार ही दे । और, जिस साधु के पास न तो शस्त्र है, न लाठी है उससे कौन डरेगा ? उससे तो सभी लोग निर्भय हैं, और वह साधु खुद निर्भय है । जो सदाचारी हो, जिसका व्यवहार नम्रता, परोपकार दयालुता ये सब गुण आ जायें तो दूसरे लोग उसका भय न करेंगे । तो यहाँ यह उपदेश किया है कि तू जीवों को अभयदान दे । इसका अर्थ यह है कि तू अपनी ऐसी चर्या बना कि तेरे कारण जीव अभय रहा करें ।

सब जीवों को समान निरखो ― समस्त जीवों से तू प्रशंसनीय मित्रता को कर । सबसे बड़ी मित्रता तो यही है निष्कपट, नि:स्वार्थ बनकर सब जीवों को अपने समान समझ लेना । जिसके आधार पर फिर मित्रता में जो बात चलनी है वह चलने लगती है । किसी भी जीव को दु:ख उत्पन्न न हो ऐसी अभिलाषा का जगना मित्रता है । मित्रता का अर्थ ही यह है कि दूसरे का दु:ख न चाहे, दूसरे जीव को दु:ख उत्पन्न न हो ऐसी उत्कृष्ट मित्रता का भाव हमारे तब हो सकता जब हम सब जीवों को समान समझें । हमने जिसको अपने समान माना है तो जिस बात से हमें दु:ख होगा उस बात से इसे भी दु:ख होता है यह निर्णय रहता है । तो हे भव्य ! तू सब जीवों से प्रशंसनीय मित्रता कर और समस्त त्रस और स्थावर जीवों को अपने समान देख । जिसे आत्ममग्न होना है, आत्मध्यान करना है वह तब ही आत्मध्यान कर सकेगा जब समस्त जीवों को अपने ही समान चैतन्यस्वभावरूप समझेगा, विषमता न रखेगा ।

विषमता का आवरण हटाओ ― मैं बड़ा हूँ, यह छोटा है, ऐसी विषमता जब तक रहती है तब तक आत्मध्यान का पात्र नहीं है । एक अटक लग गयी है, विकल्प लग गया है । किसी जीव को अपने से बड़ा समझ लिया, किसी को छोटा समझ लिया तो वह भी एक आवरण है, वहाँ भी वह नि:शंक नहीं रह सकता । जिसे आत्मध्यान चाहिए उसका परिणाम सब जीवों को एक समान निरखने का होगा, और सब जीव एक समान समझ में आयें उसका उपाय है केवल, उनके स्वरूप की दृष्टि रखना । यद्यपि सब जीव समान नहीं रह सकते हैं । संसार में किसी का ज्ञान बड़ा है, किसी का ज्ञान थोड़ा है, किसी की पर्याय कुछ है, प्रकृति का भेद है तो ऐसे पर्याय वाले जीवों को एक समान कैसे समझा जायेगा ।

स्वरूपदृष्टि से संकल्प विकल्पों की मुक्ति ― इन पर्यायों पर दृष्टि न गड़ाकर सब जीवों के सहज सत्त्व की ओर दृष्टि देते हैं और उसमें उसके चित्त में विकल्प भी नहीं रहते, बुराई भी नहीं रहती । ऐसा पुरुष आत्मध्यान का पात्र है । हे भव्य जीव ! यदि तुझे भव-भव के कर्म संकट समाप्त करना है तो तू सब जीवों में तत्त्वस्वरूप को देख जिससे रागद्वेष का अवसर न आये और अपने ही स्वरूप का अनुभव बना रहे । इसमें ऐसा ध्यान बनेगा कि ये कर्म और संकल्प विकल्प ये सब दूर हो जायेंगे ।


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