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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 528

From जैनकोष



अहिंसाव्रतरक्षार्थं यमजातं जिनैर्मतम्​ ।नारोहति परां कोटिं तदेवासत्यदूषितम्​ ॥528॥

अहिंसाव्रत की रक्षा के हेतु अन्य व्रतादि ― यों तो जितना भी व्रतों का समूह बताया है जिनेंद्रदेव ने, अमुक व्रत करो, अमुक तपश्चरण करो, वे सब एक अहिंसाव्रत की रक्षा के लिए बताया है । जैसे पापों में पाप एक हिंसा है, हिंसा में सब पाप आ गये, सब पापों में हिंसा पड़ी हुई है । ऐसे ही समस्त व्रतों में एक अहिंसाव्रत है । अहिंसा में सब व्रत आ गए और सब व्रतों में अहिंसा पड़ी हुई है । हिंसा का अर्थ है अपने आपमें विकार उत्पन्न करना और अपने शुद्ध ज्ञान दर्शन को प्रकट न होने देना, उसका घात करना, आकुलित रहना, अपने आपको पदभ्रष्ट बनाये रहना यह है वास्तव में हिंसा । और जिस मनुष्य के ऐसा हिंसा का परिणाम रहता है उसकी प्रवृत्तियाँ ऐसी होती हैं जिससे दूसरे जीव भी दु:ख पाते हैं । तो प्रवृत्तियों से दूसरों को दु:ख पहुँचाना यह है द्रव्यहिंसा ।

समस्त पापों में हिंसा ― जो मनुष्य झूठ बोलता है, झूठ बोलकर वह अपने चैतन्यप्राण का तो घात तुरंत करता ही है क्योंकि उसका खोटा आशय है । झूठ बोलकर अपने आपका घात किया है तो झूठ मे हिंसा पड़ी है । किसी मनुष्य ने परधन हरा तो परधन हरना कोई शांति और समता से नहीं हुआ करता । अनेक विकल्प अनेक खोटी भावना, दूसरों को सताने के भाव अथवा दूसरे कैसे ही दु:खी रहें उनकी ओर से कोई ख्याल ही न रहे करुणा का तो क्या यह कोई बुद्धिमानी की बात है ॽ चोरी करने में भी हिंसा पड़ी हुई है अतएव चोरी भी हिंसा है । यों कुशील ― ब्रह्मचर्य का घात यह भी हिंसा है । द्रव्यहिंसा भी है और साथ ही खुद का परिणाम विकृत है, अज्ञानमयी है तो वहाँ भी हिंसा हैं । यों कुशील पाप भी हिंसा ही है । इसी प्रकार परिग्रह का संचय करना यह भी हिंसा ही है । परिग्रहसंचय के समय अपने आपकी कुछ सुध-बुध नहीं रहती । धन की ओर ही दृष्टि है । जैसे बने वैसे ही इसे बढ़ावो ऐसी ही दृष्टि रहती है तो अपने प्राणों का घात किया, और फिर परिग्रहसंचय में ऐसा यत्न होता है कि दूसरे जीव भी दु:खी हो जाते हैं । तो वहाँ भी हिंसा हुई । यों समस्त पापों में हिंसा ही हिंसा भरी पड़ी हुई है ।व्रतादि का प्रयोजन अहिंसक जीवन ― ऐसे ही समझिये कि जितने भी व्रत तप आदिक करना हो तो उन सबका प्रयोजन अहिंसा है । अपने आत्मा की सुध बनाये रहना, अपने आत्मध्यान की विशेषता बनाये रहना यह सब व्रत और तपस्यावों में उद्देश्य भरा हुआ है । तो अहिंसा व्रत की रक्षा के लिए ही जिनेंद्रदेव ने अनेक प्रकार के यम, नियम, व्रत आदिक बताया है । जैसे इसही प्रकरण से यह दृष्टि करें कि यदि सत्य महाव्रत न उतरे, असत्य वचनालाप बना रहे तो उससे अहिंसाव्रत में उत्कृष्टता नहीं बन सकती, अहिंसाव्रत नहीं बन सकता ।

सत्यमहाव्रत का उद्​देश्य अहिंसा ― तो यह सत्य महाव्रत भी अहिंसाव्रत की रक्षा के लिए है । आत्महित सर्वोच्च है और आत्महित के अभिलाषी पुरुष आत्महित के ही प्रोग्राम में परहित का ही प्रयत्न करते हैं । मैं दूसरों का भला कर दूँ इस प्रकार की अभिलाषा से या इस प्रकार के आशय से ज्ञानी पुरुष परोपकार नहीं करते किंतु ज्ञानी पुरुष का यह एक प्राकृतिक आचरण बन जाता है कि उसे अभीष्ट तो है आत्महित, समाधि, ज्ञातादृष्टा रहना, किंतु उस स्थिति में वह ज्ञानी जब नहीं रह पाता है तो उसका प्राकृतिक आचरण ऐसा है कि हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह ये पाप इसमें घर नहीं कर सकते । तो वह यत्न है परोपकार ।

परोपकार ― उपदेश देकर दूसरों को धर्म में लगाना अथवा अन्य प्रकार से सेवा करके वात्सल्य दिखाकर, अभय देकर उनको निर्भय बनाना, निराकुल बनाना ऐसी प्रवृत्ति होती है तो यह परोपकार भी आत्महित में साधक है । मैं पर का यों उपकार कर दूँगा, मैं पर को यों सुखी कर दूँगा ऐसा अभिमानवश कोई परोपकार करे तो परोक्ष की बात तो जाने दीजिए वह तो दूर ही है । वैसे तो मोह भी नहीं मिटा, मिथ्यात्व भी नहीं मिटा । ज्ञानी पुरुषों को परोपकार करने की एक प्रकृति बन जाती है अभिमानवश नहीं किंतु अपने हित के लिए । ज्ञानी पुरुष अपने को पापों में नहीं लगाना चाहता है और रागांश उठ रहे हैं तो उस ज्ञानी की प्रवृत्ति परजीवों के उपकार के लिए बन जाती है । यों यह सत्य व्रत भी अहिंसा की रक्षा के लिए है । और, जिनका अहिंसक जीवन है वे पुरुष निज ब्रह्म की सुध बहुत-बहुत रख सकते हैं, और उपायों से इस आत्मतत्त्व का ध्यान बनाये रह सकते हैं ।

सर्वोपरि कर्त्तव्य आत्मध्यान ― आत्मध्यान सर्वोपरि कर्तव्य है । अपने दिन रात के चौबीस घंटों में यदि दो एक मिनट ही रोज अपने आत्मतत्त्व पर दृष्टि जगे तो उसके प्रसाद से आगामी सारा दिन एक निराकुल, निर्भय और विश्रांत सा अपने को लगने लगता है । आत्मध्यान सर्वोपरिकार्य है । उसके लिए कर्तव्य है कि हम अपने आशय को सत्य बनायें । किसी भी जीव को विरोधी न समझें । अपने ही स्वरूप के समान सबका स्वरूप जानें ।


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