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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 530

From जैनकोष



अनेकजन्मजक्लेशशुद्धयर्थं यस्तपस्यति ।सर्वं सत्त्वहितं शश्वत्स ब्रूते सूनृतं वच: ॥530॥

सत्य वचन से लाभ ― जो साधु अनेक जन्मों में उत्पन्न हुए क्लेशों की शांति के लिए तपश्चरण करते हैं वे सुंदर सत्य वचन ही बोलते हैं क्योंकि असत्य वचन बोलने से साधुपना नहीं रहता । सत्य वचन बोलने से लौकिक पद्धति में भी बड़ी नि:शंकता रहती है । किसी की झूठ बात बोल दी जाय, किसी की चुगली कर दी जाय तो ऐसा झूठ बोलने वाले पुरुष को चिंता शल्य बना रहता है । प्रथम तो यह शल्य रहता कि झूठ तो बोल दिया, पर इसका यदि भेद खुल गया और दूसरे ने समझ लिया कि हमने झूठ बोला है तो हमारी क्या इज्जत रहेगी और फिर झूठ बोला है उसे यह आत्मा तो खुद जानता है । दूसरा कोई जाने अथवा न जाने लेकिन स्वयं तो समझ रहा है कि मैने असत्य वचन का पाप किया है । तो खुद की दृष्टि में तो यह बुरा हो गया और वही-वही खुद की जानकारी में है तो स्वयं यह शल्य रहेगा ।

असत्यवचन से हानि ― तो असत्य वचन से चिंता शोक आदिक बढ़ जाते हैं । अपने और पर के चित्त में भी शल्य बढ़ जाता है । ऐसे साधुजन जो आत्मध्यान में सफलता चाहते हैं उन्हें चाहिए कि सर्वदा सत्य वचनों का प्रयोग करें । सत्य से ही साधु की प्रतिष्ठा है और सत्य से ही मनुष्यमात्र की प्रतिष्ठा है । यहाँ भी जो कुछ भी व्यापार आदिक कार्य चलते हैं, व्यवहार के कार्य चलते हैं । लोग भले ही कुछ ऐसा कहें कि सच अगर बोला जाय तो लोग रोटियाँ भी न खा सकें, उन्हें कुछ आय भी न हो सके, लेकिन यह तो सोचो कि दुकानदार भी चाहे वह झूठ बोल रहा हो मगर मुद्रा तो ऐसी बनी है, रूपक तो यों बना है कि जिसमें ग्राहक यह समझ जाय कि यह सत्य ही बोल रहा है तभी तो व्यापार चल रहा है । झूठ बोलने पर भी सत्य बोलने की मुद्रा में, वातावरण में व्यापार चलता है । यदि ग्राहक यह समझ जाय कि यह तो सरासर झूठ बोलता है तो कहीं काम चल सकता है क्या ॽ तो झूठ चाहे चोरीरूप से रखा है लेकिन खुले रूप से झूठ के कारण कुछ भी काम नहीं चल सकता है । तो जो भी व्यापारिक कार्य चल रहे हैं उनका मुख्य कारण कुछ एक सत्य का वातावरण है । यदि कोई मनुष्य अंतरंग में भी असत्य हो और बहिरंग में भी असत्य के वातावरण में हो तो भले ही प्राय: लोग असत्य व्यवहार करते हैं अतएव कुछ वहाँ संकट में रहे किंतु जब जनता जान चुकती है कि आत्मा तो सत्य ही है तो उनके व्यापार में बड़ी विशेषता बढ़ जाती है । असत्य वचन बोलने में आत्मा में शल्य चिंता शोक कर्मबंध उद्वेग सभी बातें बढ़ने लगती हैं । साधु पुरुष भव-भव के बाँधे हुए पापकर्मों के विनाश के लिए यत्न करते हैं, जन्म-जन्म के क्लेश दूर हों इसके लिए तपश्चरण करते हैं तो ऐसे उत्कृष्ट तपश्चरण की ओर झुकाव रखने वाले साधु असत्य वचन बोलने की मन में कभी भी बात नहीं सोच सकते हैं । असत्य वचन बोलने से साधुता नहीं रहती ।


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