• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 532

From जैनकोष



मौनमेव हितं पुंसां शश्वत्सर्वार्थसिद्धये ।वचो वाचि प्रियं तथ्यं सर्वसत्त्वोपकारि यत्​ ॥532॥

अधिकतर मौन रहने की शिक्षा ― समस्त अभीष्ट प्रयोजन की सिद्धि के लिए सर्वप्रथम तो यह निर्णय दिया गया है कि कल्याणार्थी पुरुष को निरंतर मौन का ही आलंबन करना चाहिए, किंतु यदि वचन कहना ही पड़े तो ऐसा कहना चाहिए जो सबको प्रिय हो, सत्य हो और समस्त जनों का हित करने वाला हो । जब कोई ऐसी शंका हो कि ऐसी बात बोलना चाहिए या न बोलना चाहिए तो उसमें अधिक निर्णय न बोलना चाहिए का रखना चाहिए । कभी-कभी जीवन में ऐसे प्रसंग आ जाते हैं कि चित्त चाहता है कि हम इसको यह बात कह दें, कुछ चित्त चाहता है कि न कहें । यह बात कहने में भला है अथवा यह बात न कहने में भला है, जब ऐसी संसयकोटिपर अपना उपयोग जाने लगे तो उस समय यह निर्णय रखिये कि न कहना अच्छा है । प्रवृत्ति और निवृत्ति इन दोनों के मध्य यदि कोई शंका आ जाय कि क्या करें, यह काम करूँ या न करूँ तो निवृत्ति का निर्णय तो तब तक रखियेगा जब तक संदेह है । इस जगत में जीवों से बोलते रहने का प्रयोजन किया, अधिक बोलचाल से कौन सी सिद्धि होती है, आत्मबल कम होता है और अधिक बोलने से पता नहीं कोई ऐसी बात बोलने में आ जाय जो तुच्छता का सूचक हो, दूसरों को कष्ट देने वाला हो, तो पीछे शल्य सी बन जाती है, अतएव मौन की प्रवृत्ति अधिक रहनी चाहिए । जरूरत समझो तब बोलो । और जब भी बोलो तब ऐसे वचन बोलो जो सर्व का हित करें, तथ्य हों, यर्थाथ हों ।

मौन से लाभ ― प्रयोजन सबके हित का है । अपना भी कल्याण हो और दूसरे जीवों का भी कल्याण हो । इस कल्याण के प्रयोजन की सिद्धि के लिए वचन बोले जाते हैं, अन्यथा वचनों की क्या जरूरत है । हित का प्रयोजन आत्मा के सही हित से है । यों तो जो कोई बोलता है वह इंद्रियविषयों की पूर्ति के लिए, साधना के लिए वचन बोला करता है, वे वचन तथ्यरूप नहीं हैं, सत्य नहीं हैं । जिसमें जीव को सहज शांति प्राप्त हो, एक समीचीन दृष्टि मिले, सदा के लिए संसारसंकट से छूट जाने का उपाय मिले ऐसे वचन ही सत्य वचन कहलाते हैं । तो प्रथम तो मौन का अधिक उपयोग होना चाहिए और मौन की अधिक प्रवृत्ति होने पर विवेक रहना बड़ा सुगम रहता है, बुद्धि कई गुना बढ़ जाती है । जो समस्यायें बड़ी कठिन आ गयी हों जिनका हल करना कठिन है वे समस्यायें भी सुलझ जाती हैं, उनका मार्ग भी नजर आने लगता है कि किस तरह यह विपदा दूर हो सकती है । मौन में विवेक बढ़ता है, प्रतिभा बढ़ती है, शांति प्राप्त होती है अतएव वचनों के प्रसंग में सर्वप्रथम सत्यवचन गुप्ति को दिया गया है ।

वचन के संबंध में 4 प्रकार की हित की स्थितियाँ ― वचन के संबंध में 4 प्रकार की हित की स्थितियाँ होती हैं सत्य महाव्रत, भाषासमिति, सत्यधर्म और वचनगुप्ति । इन चारों में सर्वोच्च धर्म है वचनगुप्ति । जब वचन बोलने की आवश्यकता ही समझी जाय, जिसमें अहित का परिहार है, हित की प्राप्ति है और बोलना आवश्यक है ऐसी स्थिति जब समझें तब भाषासमिति का प्रयोग करें । भाषासमिति में हित मित प्रिय वचन बोले जाते हैं तो वचन गुप्ति और भाषासमिति इन दोनों धर्मों को पाला जाता है आत्मध्यान की सिद्धि करने वाले पुरुष के द्वारा । अब सत्यधर्म और और सत्य महाव्रत भाषासमिति से कुछ और चिगे तो सत्य धर्म में उसकी स्थिति रह जाना चाहिए, इससे और नीचे न गिरें । सत्यधर्म से मतलब है कि वचन बोले तो सत्य और आत्मा ही आत्मा की बात बोले, फाल्तू परसंबंधी बात न बोले । जब इससे भी हटें तो सत्य महाव्रत में स्थित करें । सच बोलें, आत्मा की बोलें चाहे पर की बोलें मगर असत्य वचन का प्रयोग न होना चाहिए । और, इससे नीचे फिर साधुता रहती नहीं । तो सर्वोत्कृष्ट बात तो हुई वचनों की गुप्ति । मौन से रहना और वचनगुप्ति से न रह सके, वचन कहना ही पड़े, कोई बात आवश्यक ही दिखे तो ऐसे वचन बोलें जो सबको प्रिय हों, सत्य हों और समस्त प्राणियों का हित करने वाले हों ।

आत्महित संबंधी वचनों से उत्थान ― जीव जीव सब एक स्वरूप हैं । हम और अन्य जीव स्वरूपदृष्टि से देखो तो सब चैतन्यात्मक हैं । यह जो भेद पड़ गया है एक उपाधि के संबंध से भेद पड़ा हुआ है । स्वरूपदृष्टि से तो सब जीव एक समान हैं । और, जो एक समान होते हैं उन्हें एक कह दिया जाता है । सब जीव एक हैं । स्वयं में जब इस जीव स्वरूप की एकता का भान हुआ और उसमें जो आनंद का अनुभव किया उसके पश्चात् इस ज्ञानी जीव को यह भावना हो जाती है तब पर की ओर दृष्टि जाती है कि देखिये तथ्य की बात तो यह है जीव स्वयं ज्ञानानंद स्वरूप है । इसे आनंद पाने के लिए बाहर में कुछ करने को नहीं पड़ा हुआ है । स्वयं ही आनंदरूप है समझ लो और जो भ्रम कर रखा है, पर की ओर आकर्षण बना रखा है वह मिट जाय । जीव स्वयं सुखस्वरूप है । इसको इसकी दृष्टि प्राप्त हो ऐसी करुणा जगती है और इस करुणा भरे भाव में दृष्टि जाती है, फिर जो वचन बोलते हैं वे शुद्ध आत्महित के लिए वचन बोलते हैं । भला ऐसा आत्महित करने के लिए वचन बोले जायें तो वे अनापसनाप होंगे क्या ? वे परिमित होंगे और साथ ही साथ जब दूसरे जीवों का भला करने के लिए वचन बोले जा रहे हों तो क्या वे कटुक कठोर अप्रिय होंगे ? वे तो बड़ी शांत्वना के साथ प्रिय भी लगें ऐसे वचनों के साथ होंगे । तो प्रथम कार्य तो यह है कि बोले ही नहीं । मौन का आलंबन करे और बोलना पड़े तो ऐसे वचन बोले जो सत्य हों, प्रिय हों, हितकारी हों । ऐसे व्यवहार से जीवन का बड़ा उत्थान होता है ।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव_-_श्लोक_532&oldid=84233"
Categories:
  • ज्ञानार्णव
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:34.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki