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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 549

From जैनकोष



सतां विज्ञाततत्त्वानां सत्यशीलावलंबिनां​ ।चरणस्पर्शमात्रेण विशुद्धयति धरातलम्​ ॥549॥

उत्तमपुरुष ― ऐसे संतजन जिन्होंने तत्त्व का मर्म जाना है, सत्य और शील का अंतर्ध्यान का जिन्होंने आलंबन लिया है ऐसे संतपुरुषों के चरणों के स्पर्शमात्र से यह धरातल विशुद्ध हो जाता है । अर्थात्​ जिन्होंने वस्तु के अंत:स्वरूप को परखा है प्रत्येक पदार्थ अपने आपमें स्वतंत्र है, किसी पदार्थ का कोई पदार्थ कुछ नहीं लगता, ऐसी जिनकी दृष्टि निर्मल बन गयी है, किन्हीं भी पदार्थों को निरखकर उनको स्वतंत्ररूप में देखने की प्रकृति जिनकी बन गयी है ऐसे पुरुष पवित्र हैं और उन पुरुषों का चरण स्पर्श जहाँ-जहाँ होता है वह क्षेत्र विशुद्ध हो जाता है । जिनका केवल एक ही लक्ष्य रहा है, मैं अपने शुद्ध ज्ञानानंदस्वरूप में मग्न होऊँ, इसके अतिरिक्त दुनिया में अन्य किसी चीज की चाह नहीं है ऐसे विशुद्ध शील का आलंबन लेने वाले पुरुषों का चरण स्पर्श जहाँ होता है वह क्षेत्र पवित्र हो जाता है अर्थात्​ ऐसे ही लोग उत्तम पुरुष हैं और जो असत्य वचन बोलते हैं वे पुरुष निम्न हैं, वस्तुस्वरूप के अनुकूल वचन बोलने वाले पुरुष ही मोक्षमार्ग का आश्रय लेते हैं ।

असत्य बात के चिंतन में चिंताओं की उत्पत्ति ― जब-जब भी चिंताएँ उत्पन्न होती हैं तो उन चिंतावों का मूल कारण यह है कि यह जीव असत्य बात सोचता है । प्रत्येक पदार्थ स्वतंत्र है, यही सत्य है, इससे मुख मोड़कर जब मैं अमुक का स्वामी हूँ, मेरा सुख अमुक व्यक्ति के आधार पर निर्भर है, मेरा करने वाला दूसरा है, मैं दूसरे के सुख दु:ख को करता हूँ इस प्रकार की जब स्वरूप से विपरीत दृष्टि बन जाती है तब दु:ख उत्पन्न होता है । कोई भी पुरुष दु:खी हो इस विश्व में, समाज में, देश में, विदेश में, सबके दु:ख एक किस्म के हैं कि वे सभी अपने स्वरूप से चिगकर बाहरी पदार्थों में उपयोग लगाये हैं, उनसे हित माना है ।

आशा से दु:ख ― देश के लोग मुझे भला कहें, यों देश के इन मायामयी पुरुषों से आशा रख ली जाती है उसका दु:ख है । मुझे विशेष वैभव की प्राप्ति हो तो लोग मुझे अच्छा कह सकेंगे, यों लोगों से आशा बाँध लेने पर, परवस्तु से आशा लगाने में ही क्लेश है । यद्यपि एक साधारणरूप से ऐसा लगता है कि इस गृहस्थ की परिस्थिति में तो आशा की बात आ ही जाती है, लेकिन जो यथार्थ स्वरूप जानते हैं वे गृहस्थजन इस निर्णय में रहते हैं कि आशा करने से होता क्या है ॽ जब जिसके उदयानुसार जो कुछ होना है उसे कोई नहीं जानता और होता वह अवश्य है । आशा व्यर्थ की चीज है, उदयानुसार सारी बातें सामने घटित होती हैं, फिर भी जो आशा का उदय है वह आत्मा की कमजोरी है । कार्य तो जब जो होना है वह होगा पर हम आशा किए बिना नहीं रहते हैं, यह खुद के ज्ञान दृढ़ता में कमजोरी है और इसी कमजोरी के मायने गृहस्थी है, फँसाव है, असाधुता है ।

यथार्थ तत्त्व की जानकारी में निराकुलता ― जिन्होंने यथार्थ तत्त्व को जाना वे इसी कारण तो निशंक रहते हैं अंतरंग में, वे अपनी और पर की स्वतंत्रता को दृष्टि में प्रतीति में बनाये रहते हैं । सत्य से रुचि हो, सत्यवचन का व्यवहार हो, सत्य का अपने में अभ्युदय हो ऐसा सत्यमय जीवन जिन संतों का है वे चाहे गृहस्थ हों अथवा साधु हों उन्हें अपनी परिस्थिति के अनुकूल निराकुलता अवश्य मिला करती है । इन मायामयी लोगों के बीच हम असत्य संगम करें, असत्य व्यवहार में बढ़ तो तथ्य की बात यह है कि उस हृदय में निराकुलता नहीं ठहर सकती ।


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