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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 552

From जैनकोष



अदयै: संप्रयुक्तानि वाक्​छस्त्राणीह भूतले ।सद्यो मर्माणि कृंतंति शितास्त्राणीव देहिनाम्​ ॥552॥

खोटे वचन तीक्ष्ण शस्त्र के समान ― दयाहीन पुरुषों के द्वारा चलाये गए दुर्वचनरूपी शस्त्र इस पृथ्वीतल पर जीवों के मर्म को तीक्ष्ण शस्त्रों के समान तत्काल धारण करते हैं । असत्य वचनों के समान दूसरा कोई तीक्ष्ण शस्त्र नहीं है । जितने भी विवाद झगड़े देश विदेश समाज घर के उत्पन्न होते हैं उन सबका कारण खोटा वचनालाप है । व्यर्थ ही खोटे वचनों के प्रयोग से खुद को दु:खित बनाया जाता है और जगत को दु:खित बना दिया जाता है । वचनों का भंडार तो बहुत है । अभी उस भंडार में से जिस मनुष्य का जैसा उपादान है वह अपने उपादान के अनुसार उसका प्रयोग करता है । जिसमें अज्ञान भरा है, कषाय भरी है, खुदगर्जी भरी है, इंद्रियविषयों की वासनायें भरी हैं, कषायें बढ़ी हुई हैं तो ऐसे मनुष्य शिष्ट वचनों का कहाँ से प्रयोग कर सकेंगे ।

जैसा उपादान वैसा परिणमन ― जैस उपादान है वैसा ही उनका परिणमन होता है । किसी तोतले पुरुष को कितना ही सिखाया जाय कि तुम यों शुद्ध बोलो, वह तोतला पुरुष उस प्रकार शुद्ध बोलना भी चाहता है मगर वह तो वैसा ही बोल सकेगा जैसा उसका उपादान है । कोई पढ़ाने वाले बड़े ऊँचे शास्त्री जी थे । बड़े शुद्ध लेखक थे, पर वे जरा तोतले थे । स को ट बोला करते थे । तोतले पुरुषों से स नहीं बोला जाता है, त भी नहीं बोला जाता है । सायद जो दंती स्थान के शब्द हैं त थ द ध न स ल ऋ ऐसे जो दंतस्थान के शब्द हैं वे तोतले पुरुषों से नहीं बोले जाते हैं । लेकिन वह पंडित जी व्याकरण और शब्दशास्त्र के अच्छे ज्ञाता थे । तो वह शिष्यों से कह रहे थे कि देखो बोलना था उन्हें सिद्धिर्अस्तु, पर स की जगह ट बोल पाते थे टिद्धिर्अस्तु । वह बहुत समझायें ― देखो हम कुछ भी कहें पर तुम टिद्धिर्अस्तु समझना । तो जो जिस उपादान का है उससे वैसे ही शब्द निकलेंगे । कोई चौथी कक्षा का छोटा विद्यार्थी हो उसे कोई सोचे कि हम अच्छे पढ़े लिखे मास्टर से मिडिल का कोर्स पढ़ायें तो वह विद्यार्थी मिडिल का कोर्स पढ़ जाय, यह कैसे हो सकता है । और, फिर पढ़ा देने से ही कुछ नहीं हो जाता है, कुछ व्यवहार भी तो देखा जाता है । बच्चे को केवल विद्या ही तो नहीं सिखायी जाती, कुछ व्यवहार भी तो सिखाया जाता है ।

व्यवहार की बात सीखने की शिक्षा ― आजकल लोग पढ़ाई में प्राय: विद्या की ओर ध्यान देते हैं । यह किसी तरह पास हो जाय यही पढ़ाने वाले का मुख्य उद्​देश्य रहता है । यह विद्यार्थी कुछ व्यवहार भी सीखे, इस ओर ध्यान कुछ कम है । चाहिए तो यह कि वह पढ़ाई के साथ कुछ व्यवहार भी सीखे । किसी ने पढ़ाई बहुत पढ़ ली और वह व्यवहारशून्य है तो उसकी भी तो आगे गति नहीं है । तो ऊँची संगति से विद्या भी, व्यवहार भी सभी बातों की शिक्षा मिलती है । जैसा उपादान होता है उसके अनुसार परिणमन चलता है । जो छली हैं, कपटी हैं, विषय साधनों के ही अभिलाषी हैं ऐसे पुरुषों से जो वचन निकलेंगे वे कपटभरे, मर्मछेदनहारे वचन निकलेंगे ।

उपादान के अनुसार परिणतिमूलक दृष्टांत ― एक कोई पंडित जी थे तो किसी देहात में कथा बाँचने चले गए । गाँव के सब पटेल जुड़े, कथा वार्ता शुरू हुई तो वे संस्कृत के श्लोक 15-20 मिनट तक धाराप्रवाह से बोलने लगे । उन्होंने सोचा कि इस देहाती जनता पर हमारा रोब बैठ जायेगा । सो जो उन्होंने 15-20 मिनट तक अपना सुनाने का काम जारी रखा कि एक आदमी को यह संदेह हो गया कि पंडित जी को बाय तो नहीं लग गया । बाय की बीमारी में ऐसा ही होता है । बाय वाला व्यक्ति शुद्ध नहीं बोल पाता, अटपट बोलता है । उस पुरुष को वे पंडित जी के वचन कुछ अटपट से लगे, सो सोचा कि पंडित जी के बाय लग गयी है, दिमाग बिगड़ गया है, पागल हो गए हैं, इसकी दवा करवायें । सो झट तकुवा वाले के पास गया, कहा कि पंडित जी को बाय लग गया है, उनके लोहे के दो चार गरम तकुवा लगा दो ठीक हो जायेगा । बाय रोग वाले को तकुवा से दागा जाता है । सो झट पंडित जी के हाथ पैर पकड़े और दो तीन जगह तकुवा से दाग दिया । पंडित जी अभी भी श्लोक छाँट रहे हैं । जब दो चार जगह तकुवा से दागा तो पंडित जी अपना माथा ठोकने लगे । उस आदमी ने समझा कि अभी शिर का बाय नहीं गया सो सिर में भी दो चार तकुवे दाग दिये । तो जिसमें जो योग्यता है वह उतने ही तो विचार बनायेगा, उतनी ही तो क्रियायें करेगा । किसी मूर्ख को नौकर रख लें और वह मिले कुछ सस्ता सा तो आप उससे ज्यादा नुकसान पायेंगे । तो जिसका जैसा उपादान होता है उसके अनुसार ही उसकी परिणति और वचन होते हैं । तो होते हैं ठीक है किंतु असत्य वचन और असंबद्ध वचन बोलने वाले का उपादान उत्तम नहीं है और ऐसे लोग सत्य विचार नहीं बना सकते । आत्मा का ध्यान नहीं कर सकते । दु:खों के दूर करने का उपाय नहीं सोच सकते । जिन्हें संकटों से दूर होने की वांछा है । वे आत्मध्यान की ओर दृष्टि देते हैं और वे आत्मध्यान के पात्र होते हैं जिनका व्यवहार समीचीन हो । हम वाणी अच्छी बोलें, हितकारी बोलें, अधिकाधिक मौन से रहें, ऐसे वाणी वाले व्यक्ति आत्मध्यान के पात्र होते हैं ।


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