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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 554

From जैनकोष



न हि सत्यप्रतिज्ञस्य पुण्यकर्मावलंबिन: ।प्रत्यूहकरणे शक्ता अपि दैत्योरगादय: ॥554॥

सत्यप्रतिज्ञा वाले पुरुषों के दुष्ट दैत्य और सर्पादि भी बुरे करने में असमर्थ ― जो सत्यप्रतिज्ञा वाले पुरुष हैं, पुण्य कर्म का जो आलंबन लेते हैं, धर्म में जिनकी वृत्ति है, ऐसे पुरुषों को दुष्ट दैत्य और सर्प आदिक भी कुछ बुरा करने में समर्थ नहीं हैं । कथावों में सुना होगा सौमा सती अपने धर्म से रही शील व्रत से, रात्रिभोजनत्याग व्रत से अनेक संयमों से रही और उसका पति रात्रिभोजन करने वाला और ऐसे ही उस पर जोर देने वाला था, धर्मकार्य को रोकने वाला था । बहुत-बहुत तरह से सताया, अंत में गुस्सा होकर उसने एक उपाय रचा कि सपेरे से एक विषधर सर्प एक मटके में रखवा दिया और ऊपर से पत्ते फूल अच्छी तरह से सजा दिया, और कहा कि इस मटके में हार रखा है उसे निकाल लो । अतिशय की बात है कि वहाँ से फूलों का ही हार निकला । तो ऐसी अनेक घटनाएँ पुराणों में हैं और कुछ घटनाएँ अब भी यत्र तत्र होती हैं ।

दृष्टांत ― एक बार बरुवा सागर में जब गुरूजी 7 वीं प्रतिमा में ही थे, चले जा रहे थे तो लड़के लोग गुल्लीडंडा खेल रहे थे । तो यों ही खेल-खेल में उन्होंने ही कोई गुल्ली उठा कर यों फेंकी कि वह एक लड़के के शिर में लगी । और, वह लड़का था बड़ी लड़ाकू माँ का । ऐसी माँ का लड़का था जो बहुत लड़ती थी । गुरुजी तो चले आये, बाद में वह लड़ाकू माँ बाईजी के पास आयी । गुरुजी सोचने लगे कि आज तो यह हजारों गालियाँ सुनायेगी और न जाने क्या-क्या कहेगी । जब वह आयी तो कहने लगी बाईजी से कि आज तुम्हारे भैया ने हमारे लड़के का भला किया । क्या भला किया ॽ शिर में जो वर्षों का रोग था वह बिल्कुल खतम हो गया । किसी नस पर ऐसा डट कर लगा कि वह रोग समाप्त हो गया, सो कोई जान कर या अन्जाने में आघात भी करे और उदय अनुकूल हो तो बिगाड़ नहीं होता । आप व्यापार आदिक सिलसिलों में भी देख लें, उदय अनुकूल है तो कभी-कभी उस विरोध से भी फायदा उठा लिया जाता है और उदय प्रतिकूल है तो मित्रजन सलाह देते हैं, फिर भी वह मित्रों की सलाह काम नहीं करती है । और, नुकसान होता है, तो जो मनुष्य सत्यप्रतिज्ञा वाले हैं, पुण्यकर्म का आश्रय लेने वाले हैं ऐसे आदमी को तो दुष्ट दैत्य और सर्प आदिक भी रंच बुरा करने में समर्थ नहीं होते हैं । और प्रथम बात तो यह देख लो ।

सत्य निर्विकल्प ज्ञानस्वरूप पर दृष्टिवान के रंच भी विपदा नहीं ― जब हम अपने आपके उस सत्य निर्विकल्प ज्ञानस्वरूप पर दृष्टि देते हैं तो वहाँ दूसरों की परिणति को अपनाया ही नहीं जा रहा है, वहाँ कष्ट ही क्या है ॽ कष्ट तो लोगों को दूसरों की परिणति के अपनाने का है । जो जैसा चलता है उसके मात्र ज्ञाता दृष्टा रहें तो उसमें रंच भी विपदा की बात नहीं है । तो जो सत्य तत्त्व की रुचि रखते हैं, अपने उस सत्यस्वरूप का निरीक्षण करत हैं और सत्य व्यवहार रखते हैं ऐसे सरल कोमल हृदय आदमियों को दुष्ट आदमी भी सर्प आदिक भी कुछ भी करने में समर्थ नहीं हैं ।


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