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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 560

From जैनकोष



मूकता मतिवैकल्यं मूर्खता बोधविच्युति: ।बाधिर्यं मुखरोगित्वमसत्यादेव देहिनाम्​ ॥560॥

असत्य भाषण से इंद्रिय विकलता ― असत्य भाषण करने से पुरुषों को अनेक विपदायें प्राप्त होती हैं । जो पुरुष गूँगापन पाते हैं मुख से बोल नहीं सकते हैं ऐसी बात प्राय: यह संभव है कि असत्य भाषण के फल में मिली है । मनुष्य को 5 इंद्रिय और विशिष्ट मन प्राप्त हुए हैं । इनका उपयोग यदि विषयकषायों में ही करते हैं तो इसका फल यह है कि मानो कर्म यह सोचेगा कि इसको इंद्रिय की आवश्यकता नहीं है । अमुक इंद्रिय का इसने ठीक उपयोग नहीं किया तो वे इंद्रियाँ ही न मिलें, स्थावर बन जाय । जो मनुष्य असत्य भाषण करता है तो उसे मानो जिह्वा की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसने जिह्वा का दुरुपयोग किया । किसी भी व्यक्ति के संबंध में कोई असत्य बात कहे, किसी की निंदा करे, चुगली करे, झूठी गवाही दे ये सब बातें घोर अन्याय की हैं । और, ऐसी संभाषण करने वाले लोग परभव में गूँगे बनते हैं । जो लोग मतिहीन देखे जा रहे हैं, जिनमें बुद्धि नहीं, दिमाग नहीं चलता, बुद्धि काम नहीं देती, दिमाग कमजोर है ऐसे कोई मनुष्य उत्पन्न होते हैं तो समझना कि असत्य भाषण का प्रताप है ।

असत्य भाषण से बुद्धि की अप्राप्ति ― असत्यभाषण से जो खोटा आशय बनता है उस आशय में ऐसा कर्मबंध होता कि फिर अगले भव में उसे बुद्धि प्राप्त नहीं होती और अगले भव की बात क्या, असत्य संभाषण करने वाले के इस ही भव में बुद्धि शिथिल हो जाती है । मनुष्य का दो बातों से प्रयोजन है ― एक तो आजीविका चले और एक धर्म का पालन हो । जिन बातों में न तो आजीविका का संबंध है और न धर्मपालन का संबंध है और फिर उन्हें किया जाय तो यह दुरुपयोग है बुद्धि का । हाँ कोई आजीविका में बहुत भारी विघात होता हो तो उसका कुछ ध्यान रखें, या धर्म में कोई बाधा होती हो तो ध्यान रखें, पर यह मनुष्य अपना शेष समय कितना व्यर्थ की बातों में गँवाता है । गप्पों में, विकल्पों में, व्यर्थ के झगड़ों में, विवादों में पड़ने से क्या प्रयोजन । जो सज्जन पुरुष होते हैं वे व्यर्थ की बातों में नहीं पड़ते । जिनमें कोई खास प्रयोजन हो उनमें ही अपना उपयोग लगाते हैं । जो पुरुष अधिक बोलते हैं, असत्य बोलते हैं वे पुरुष बुद्धिहीन बनते हैं । मूर्खता भी असत्य भाषण का अभिशाप है । अज्ञानता भी असत्य भाषण से मिलती है । बहिरे होना, मुख में रोग होना ये सब बातें असत्य भाषण से बँधे हुए कर्म का फल है ।

सत्य भाषणपना शुद्ध आशय बिना नहीं ― सत्य भाषण वही कर सकता है जिसका आशय पवित्र हो, व्यर्थ के राग विरोध न हों, इन परिग्रहों में आशक्ति न हो । जिसे यह सही बोध है कि मेरा आत्मा केवल अकेला ही है, अकेला ही आया, अकेला ही जायेगा, सर्वत्र अकेला है, सुख दु:ख भोगता है वहाँ भी अकेला है, रागद्वेष करता है वहाँ भी अकेला, संसार में रुलता है सो भी अकेला, मोक्ष पाये सो भी अकेला । इस आत्मा का कोई दूसरा साथी नहीं है । उस ही आदमी की ऐसी विरक्ति होती होगी कि वह असत्य भाषण न करेगा, जो असत्य बोलते हैं उन्हें आत्मा की सुध नहीं होती, न आत्मा का ध्यान कर सकते । जगत में अन्य किसी पदार्थ का भी ध्यान करे, वैभव, मित्रजन, परिवार, यश कितनी भी चीजों का ध्यान करें, उनकी आशा रखें उसमें शांति तो न मिलेगी ।

आत्मा का शुद्ध ज्ञान शांतिप्रदायक ― खूब परख लो । शांति का कारण है आत्मा का शुद्ध ज्ञान । शुद्ध ज्ञान वह कहलाता जहाँ प्रत्येक पदार्थ अपने-अपने स्वरूप में नजर आता है । अभी हम बोल रहे, आप सुन रहे इस प्रसंग में कुछ लोग यह सोच सकते हैं कि वक्ता हमें समझा रहे हैं, लेकिन ऐसी बात नहीं है । वक्ता जो कुछ भी बोलता है वह अपने भावों के अनुसार अपनी शांति के लिए जो मन में एक मंदकषाय उत्पन्न हुई है उसकी पूर्ति के लिए अपनी चेष्टा करता है, श्रोताजन अपने ही परिणमन से, अपने ही ज्ञान पौरुष से एक मात्र निमित्त पाकर अपने में ही अपना निर्णय करते हैं । न कोई समझता है और न किसी के समझाने से कोई समझता है । इसी प्रकार कोई सोचता हो कि मेरा अमुक से राग है, मेरा मुझमें बड़ा प्रेम है यह बात भी असत्य है ।दो द्रव्यों में असंबंधपना ― कोई मनुष्य किसी दूसरे से प्रेम कर ही नहीं सकता । जो करता है प्रेम वह अपने आपमें अपनी कषाय की पूर्ति के लिए अपना परिणमन करता है । उसको देखकर दूसरा चूँकि वह अनुकूल परिणमन है यह मान बैठता है कि यह मुझसे राग कर रहा है । कोई जीव किसी दूसरे जीव का कुछ भी करने में परमार्थत: समर्थ नहीं है । केवल एक निमित्तनैमित्तिक परिणमन है, हो रहा है । यहाँ यह निर्णय कीजिए कि हमारी भलाई किसमें है । यों तो अनादि से जन्म लिया, मरण किया, यों परंपरा चली आयी और आज हम मनुष्य हुए, लेकिन ऐसी जन्म और मरण की परंपरा ही चलाते रहे तो तत्त्व की बात क्या प्राप्त की ?

ज्ञानी के गृहस्थी में निर्लेप रहने की बात ― देखिये गृहस्थी का जीवन भी, गृहस्थ का धर्म भी बहुत महत्त्व की बात रखता है । घर में रहते हुए भी घर में निर्लेप रहना और गृहस्थी का निर्वाह करना, यह बात एक असाधारण है, किसी साधारण मनुष्य से यह बात नहीं निभ सकती । ज्ञानी हो, समर्थ हो वही पुरुष इस बात को निभा सकता है और आनंद भी उस तत्त्व का आता है जो तत्त्व हमारी दृष्टि में समाया है । गृहस्थ घर में रहता है, रहे, किंतु वह ज्ञानी है और उसकी दृष्टि में प्रभु का आत्मा का शुद्ध स्वरूप समाया है तो उसका आनंद विलक्षण है । कोई मनुष्य घर छोड़कर एक त्यागभेष भी बनाये किंतु वह घर गृहस्थी की लालसा रखे तो ऐसा त्याग करने पर भी उसने रस तो गृहस्थी का ही लिया । वहाँ आत्मीय आनंद नहीं जगा ।

दृष्टि के अनुसार आनंद प्राप्ति पर दृष्टांत ― स्थिति कुछ भी हो, भेष कैसा ही हो, किंतु दृष्टि जैसी होगी आनंद वैसा प्राप्त होगा । इसके लिए एक उदाहरण दिया जा रहा है । राज्यसभा में राजा ने अपने मंत्री को नीचा दिखाने के लिए एक बात छेड़ दी है कि हे मंत्री आज रात्रि को मुझे ऐसा स्वप्न आया है कि हम और तुम दोनों घूमने जा रहे थे, रास्ते में दो गड्ढे मिले, एक में मैला भरा था और एक में शक्कर भरी थी, सो हम तो गिर गए शक्कर के गड्ढे में और तुम गिर गए मैले के गड्ढे में । तो मंत्री बोला महाराज हमें भी ऐसा ही स्वप्न आया कि हम तुम दोनों कहीं घूमने जा रहे थे, सो शक्कर के गड्ढे में आप गिर गये, मैला के गड्ढे में मैं गिर गया, पर एक बात और देखी कि आप हमें चाट रहे थे और हम आपको चाट रहे थे । अब सोचिये कि मंत्री ने तो चाटा शक्कर और राजा को चटाया मैला । तो ऐसे ही समझिये कि ज्ञानी पुरुष गृहस्थी में भी रहता है किंतु उसे तात्विक निर्णय है कि समस्त समागम असार हैं, अहित हैं, भिन्न हैं, विनाशीक हैं, इनसे मेरा स्वरूप नहीं है ।

ज्ञानी के आत्मस्वरूप में हितपने का निर्णय ― मेरा हित, मेरा स्वरूप तो मेरे आत्मा में ही है। ऐसी अपनी प्रतीति रखता है तो वह स्वाद ले रहा है आत्मीय आनंद का । कोशिश यह रखना चाहिए कि इस ज्ञानदृष्टि में अधिकाधिक बढ़ें, बड़ा होने से, वैभववान होने से, जैन शासन के सुयोग पाने का यही एक फल है कि हम ऐसी चीज पा लें जो चीज संसार में अतीत दुर्लभ है । आप बारह भावना में पढ़ते हैं ना-धन कन कंचन राजसुख, सबहि सुलभ कर जान । दुर्लभ है संसार में एक यथारथज्ञान ॥ सभी चीजें सुलभ हैं, बड़े-बड़े राजपाट भी सुलभ हैं पर आत्मा का यथार्थज्ञान होना अतीत दुर्लभ है ।

सत्य ज्ञान से अपनी समृद्धि ― अब देख लीजिए कि हम उस दुर्लभ ज्ञान के पाने के लिए ― कितना तन, कितना मन, कितना धन और कितना वचन लगाते हैं, और जो असार हैं उन विषयकषायों की पूर्ति के लिए भोगोपभोग में हम कितना तन, मन, धन, वचन लगाते हैं, कुछ विवेक करना चाहिए और इस पर खेद लाना चाहिए कि हमारा ज्ञानार्जन के लिए विशेष पुरुषार्थ नहीं जग रहा है । कोशिश यह करें कि ज्ञानार्जन का विशेष पुरुषार्थ करें, सत्य ज्ञान होगा तो सत्य भाषण भी होगा, और सत्य भाषण होगा तो इस लोक में भी समृद्धि मिलेगी और परलोक में भी समृद्धि मिलेगी ।


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