• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 562

From जैनकोष



प्रसन्नोन्नतवृत्तानां गुणानां चंद्ररोचिषाम्​ ।संघातं घातयत्येव सकृदप्युदितं मृषा ॥562॥

एक बार भी असत्य प्रलाप से राज वसु को नरक की प्राप्ति ― कोई मनुष्य एक बार भी झूठ बोल दे तो बड़े-बड़े ऊँचे गुणों के समूह को भी नष्ट कर देगा । एक राजा वसु हुए हैं जो सत्य बोलने में बड़े प्रसिद्ध थे । उनके सत्य बोलने के प्रताप का वर्णन ऐसा आता है कि उनका सिंहासन भी पृथ्वी से कुछ अधर रहता था । लेकिन एक बार जब पर्वत और नारद का विवाद हुआ तो नारद का कथन था कि अजै: अस्तव्यं, जिसका अर्थ है जो डगे नहीं ऐसे पुराने धान से यज्ञ करना चाहिए और पर्वत का कहना था कि अज मायने बकरे से यज्ञ करना चाहिए । इसका निर्णय करने के लिए वसु राजा को दोनों ने स्वीकार किया । पर्वत की माँ राजा वसु के पास पहुँची । कहने लगी कि हम तुमसे गुरु दक्षिणा लेने आई हैं, क्या तुम दक्षिणा दोगे ॽ हाँ हम देंगे । फिर पर्वत की माँ ने सारा कथन सुनाया और कहा कि तुम यह कह देना कि जो पर्वत कहता है सो ठीक है । तो जब विवाद चला तो राजा वसु ने कह दिया कि जो पर्वत कहता है सो ठीक है । यों एक बार झूठ बोलने के प्रताप से उसका सिंहासन जमीन में धस गया, वसु का प्राणांत हुआ और नरक गया । एक बार असत्य बोलने का परिणाम यह हुआ । बहुत से लोगों को असत्य बोलने की प्रकृति पड़ जाती है ।

असत्य समागमों से मुख मोड़ो ― जगह-जगह असत्य बोलते हैं, पर उन्हें यह पता नहीं कि असत्य बोलने से अपना यह आत्मदेव ढका रहता है, परमात्मतत्त्व के दर्शन नहीं होते हैं । जिसे अपने निराकुल आत्मस्वरूप का भान नहीं है वह कहाँ दृष्टि लगाकर संसार के इन कठिन संकटों को दूर करे ॽ असत्य भाषण से दूर रहें और असत्य जो ये समागम हैं इन समागमों का भी हठ न करें, इनमें ममता न करें, जो हैं सो ठीक हैं, उनके ज्ञाता दृष्टा रहें ।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव_-_श्लोक_562&oldid=84266"
Categories:
  • ज्ञानार्णव
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:34.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki