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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 564

From जैनकोष



अनुभव करना हमारा कर्तव्य है ।

जगद्वंद्ये सतां सेव्ये भव्यव्यसनशुद्धिदे ।शुभे कर्माणि योग्य: स्यान्नासत्यमलिनो जन: ॥564॥

असत्यवादियों को शुभकार्य करने का निषेध ― असत्य वचन बोलना इतना निंद्यनीय है कि शुभ कार्यों में लोग असत्यवादी को शामिल नहीं करते हैं । जो शुभ कार्य हैं उनमें लोगों को विधवा स्त्री वगैरह का परहेज रहता है । वस्तुत: असत्यवादी कोई मालूम पड़े तो उसे कोई शुभकार्यों में हाथ नहीं लगने देते हैं । जो शुभ कार्य सारे जगत के द्वारा वंदनीय हैं, कष्टों से बचाने वाले हैं ऐसे शुभकार्यों में असत्यवादी पुरुष योग्य नहीं गिने जाते हैं । जैसे कोई महायज्ञ हो, विधान हो, पंचकल्याणक वगैरह का शुभ कार्य हो और मालूम पड़ जाय कि अमुक आदमी एकदम असत्यवादी है तो ऐसे पुरुष को लोग इन शुभकार्यों में शामिल नहीं करते । शुभकार्यों में झूठ का अधिकार नहीं है । और, मान लो कोई लोकव्यवहार में उसे शामिल कर ले तो वास्तव में उस झूठे पुरुष को शुभकार्यों में शामिल होने का अधिकार नहीं है । जैसे कोई व्यसनी आदमी, परस्त्रीगामी आदमी, वेश्यागामी आदमी पूजा करे तो उसे पूजा करने का अधिकार नहीं है । ऐसे पुरुषों को शुभकार्यों में शामिल होना योग्य नहीं बताया है । देवपूजा, गुरुपास्ति, स्वाध्याय, तप, दान, संयम वगैरह ये शुभकार्य हैं । जो लोग झूठे हों, पापी हों, अन्यायी हों, दगाबाज हों वे यदि दान करें तो भी वास्तव में वह दान नहीं है । उनका दान केवल लोक में पाप धोने के लिए है । जो न्याय की कमाई करे, सत्यवादी हो वह दान देने का अधिकारी है, उसका ही दान वास्तविक दान है ।

प्रभु पूजन में स्वरूप ग्रहण ― प्रभु पूजा में जो प्रभु का स्वरूप है, सो अपना स्वरूप है, प्रभु के पूजन में अपना ही स्वरूप पूजा जाता है । प्रभुपूजा में मुख्य काम है अपने स्वरूप का ग्रहण करना । अपने स्वरूप का ग्रहण क्यों नहीं हो पाता, उसका कारण है एक तो बाह्य परिग्रहों में रागद्वेष ममता आसक्ति है । दूसरा कारण यह है कि प्रभु का और आत्मा के स्वरूप का भली भाँति परिचय नहीं किया । तो अपने स्वरूप को ग्रहण करने के लिए दो यत्न करना चाहिए । प्रथम तो यह यत्न करें अथवा ज्ञान रखकर, विवेक रखकर यह निर्णय रखें कि जब यह देह भी मेरा नहीं है तो फिर अन्य किसके लिए इतनी उछलकूद मचायें । घर में जितने लोग हैं उन सबका उनके साथ अपना-अपना भाग्य लगा है । कोई माने कि मैं इन परिजनों को पालता पोषता हूँ तो यह उसकी कल्पना है । यों कहो कि परिवार के लोगों का इतना पुण्य है कि जिसके पुण्य से प्रेरित होकर मैं इतने विकल्प करता हूँ, इतने श्रम करता हूँ । तो पुण्य अपना नहीं उनका है जिनके पुण्य की वजह से रात दिन श्रम किया जाता है, खुद आराम से नहीं रह पाते । तो जिनका इतना पुण्य है उनके लिए क्या चिंता करना ॽ तो कुछ साधारण विवेक इस प्रकार का रखें और आत्मा के स्वरूप का परिचय करें । उसका परिचय ज्ञानाभ्यास से होगा और कुछ प्रयोग से होगा । ज्ञानाभ्यास में तो पदार्थ का स्वरूप जानना चाहिए ।

पदार्थ स्वरूप का ज्ञान उपादेय ― 6 जाति के पदार्थ हैं ― जीव, पुद्​गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल । उसमें जीव जाति सब एक समान है चैतन्य स्वरूप । जिसका यह चैतन्यस्वरूप निर्दोष हो गया, मलरहित हो गया वह परमात्मा कहलाता है, और मेरा चैतन्यस्वरूप अभी मलिन है लेकिन मुझमें वही शक्ति है जो प्रभु में है । प्रभु के उस केवलज्ञानस्वरूप को देखें और उसके कारण अपने आपमें ज्ञानमात्र को निहारने का यत्न करें तो हो स्वरूप का परिचय और एक हो साधारण सी विरक्ति । जब तक ज्ञान और वैराग्रय ये दो न होंगे तब तक आत्मा की पूजा नहीं बन सकती । तो ऐसा करने के लिए मनुष्य को सब कुछ लगाकर करना चाहिए । लोग शांति के लिए बड़ा यत्न करते हैं, बड़ा श्रम करते हैं पर शांति जिसमें है उसका श्रम नहीं करते । शांतिस्वरूप स्वयं यह आत्मा है, उस आत्मा को ऐसा शांत निरखने का यत्न नहीं करते । बाहरी पदार्थों में ममता लगी है उससे परेशानी मची है । अब आप यह समझिये कि 24 घंटे में चौबीसों घंटा विकल्प ही तो करते हैं । रात दिन सोते समय में भी विकल्प होते हैं तो निरंतर ऐसे विकल्पों का लाभ क्या तुमने लूट लिया ॽ​ काम के समय खूब डटकर काम करो, व्यवसाय में, धनार्जन में खूब दिल लगाकर काम करो पर रात दिन चौबीसों घंटा धनार्जन के ही पीछे रहने से क्या लाभ मिलता है ॽ

ज्ञान बनाये बिना हमारा गुजारा नहीं ― ज्ञान बनाये बिना किसी का गुजारा नहीं है । विवेक वही है कि कुछ तो विरक्ति हो । एकदम तो बाह्य पदार्थों में आसक्त न रहें । आ जाय खराब परिस्थिति तो आने दो, रामचंद्र जी ने तो वनवास स्वीकार किया था, इससे बढ़कर और क्या बात होगी ॽ वहाँ भी वह आनंद में रहे क्योंकि उनके ज्ञान था । वे मोह ममता को फटकने न देते थे । अपना कर्तव्य समझते थे ।

विवेक बिना मनुष्य पशु तुल्य ― अपने कर्तव्य की दृष्टि आये तो समझो मनुष्य का जन्म है, नहीं तो कमाने में, आहार में, निद्रा में जो पशु की बात है सो अपनी बात चल रही है । लड़के बच्चों से पशु भी राग करते, उन्हें भी अपना मानते, उनके पीछे श्रम करते हैं, उनके पीछे अपनी जान लगा देते हैं, वही बात यहाँ मनुष्यों में हो रही है । धन की बात यह है कि पशु धन कहाँ रखें, उनके घर नहीं, हाथ पैर भी उनके बेढंगे हैं, बोली वाणी भी अक्षररूप नहीं है, अगर उनकी वाणी अक्षररूप होते, हाथ पैर ढंग के होते तो वे भी धनार्जन करते, वैभव को महत्त्व देते । तो उसमें अंतर यह आया कि मनुष्य ने श्रृंगार साज रहन सहन ढंग कपड़े सारी चीजें तो विलक्षण बना रखी हैं । मान लो पशुवों की भाँति ये मनुष्य भी नग्न रहते तो जंगल में बंदर भी तो फल फूल वगैरह से पेट भर लेते हैं, यह मनुष्य भी फल फूल वगैरह से जंगलों में पेट भर लेता । पर मनुष्य ने तो अपना श्रृंगार बनाया, भेषभूषा बनाया जिससे ये सारे उपद्रव करने पड़ते हैं और साथ ही मनुष्य में एक ऐब यह लग गया कि वह दुनिया में अपनी नामवरी चाहता है । पशु अपनी नामवरी नहीं चाहते हैं । मनुष्य तो नामवरी के पीछे परेशान है । पेट के लिए धन नहीं जोड़ता । पेट पालन के लिए तो साधारण श्रम से भी पेट पल जाता है मगर लोक में मेरी इज्जत हो, नाम हो, हम सबमें शान से रहें इसके लिए इतना धन कमाया जाता है । बतावो करोड़पती बनने की क्या जरूरत ॽ केवल दो रोटी से पेट भरा जाता, इतने के लिए करोड़पति होने की क्या जरूरत है मगर करोड़पति अरबपति होना चाहते हैं, संतोष किसी को नहीं है ।

इज्जत चाहने की विपदा ― मनुष्य में सबसे बड़ी विपदा यह लग बैठी कि यह मनुष्य नाम चाहता है, इज्जत चाहता है । तो जिस आत्मा के ज्ञान नहीं है वह इज्जत ही तो चाहेगा । जिस आत्मा के ज्ञान है वह धर्म को चाहेगा । दुनिया कुछ कहे, दुनिया किसी ढंग से रहे, पर अपने आपमें संतोष है शांति है तो अपने आपका भला है । मनुष्य ज्ञानी हो तो वह नामवरी नहीं चाहता, आत्मानुभव चाहता है । अनेक-अनेक बार आत्मा का अनुभव जगे इस ओर धुन रहती है, और जो अज्ञानी जन हैं उन्हें आत्मतत्त्व का परिचय तो मिला नहीं तो कहीं न कहीं लगेगा । आत्मा में तीन गुण हैं,―दर्शन, ज्ञान और चारित्र । दर्शन का काम श्रद्धा रखना, ज्ञान का काम जानना, चारित्र का काम किसी न किसी में लगे रहना, ये तीन बातें प्रत्येक जीव में पायी जाती हैं । जिसका जैसा श्रद्धान होगा वैसा ही ज्ञान होगा और उसी जगह वह लगेगा ।

ज्ञानी के सत्य आशय ― ज्ञानी पुरुष को आत्मा के सत्यस्वरूप का श्रद्धान है, मैं ज्ञानमात्र हूँ, देहरूप नहीं हूँ, ऐसा भावरूप नहीं हूँ । ज्ञान आत्मा का स्वभाव है तो उसका ही ज्ञान करना चाहता है और उस ही ज्ञानस्वरूप में लगने का यत्न करते हैं तो ज्ञानी जन ज्ञान में लगते हैं, अज्ञानी जन अज्ञान में लगते हैं । जिसने निज ज्ञानस्वरूप को पहिचाना उसने सत्य को पहिचाना । और, उसकी ही जो वार्ता करे वह सत्यवादी है । तो सत्यवादी जगत में पूज्य है, वंदनीय है, और जो झूठा है, निंदक है, चुगुल है ऐसा पुरुष शुभकार्यों के करने का अधिकारी नहीं है । भले ही अपनी नाक रखने के लिए पूजा भी करे पर वह झूठ, दगाबाज, व्यसनी जन धर्मकार्य करने का अधिकारी नहीं है, धर्मकार्यों के करने का अधिकारी तब होगा जब वह अपना पवित्र आशय बनाये ।


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