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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 570

From जैनकोष



य: समीप्सति जन्माब्धे: पारमाक्रमितुं सुधी:।

स त्रिशुद्धयातिनि:शंको नादत्ते कुरुते मतिम्।।

मुमुक्षु का परधनहरण में अप्रवर्तन- जो पुरुष संसारसमुद्र से पार होने की इच्छा करता है वह मन से, वचन से, काय की शुद्धि से अत्यंत नि:शंक होकर अपनी उपासना करता है और कभी भी दूसरे की वस्तु को ग्रहण करने की बुद्धि तक भी नहीं करता। वैसे चोरी के अनेक रूप हैं, सरकार का हक चुराना भी तो चोरी है, टिकट चुराना, टैक्स चुराना यह भी चोरी में शामिल है। यद्यपि आज के समय में बिरला ही कोई ऐसा मनुष्य मिलता है जो चोरी से बहुत बचा हुआ है। किसी तरह व्यापार में, लिखने में और कार्यों में किसी तरह से उसमें चोरी की बात आती है, फिर भी किसी किसी के यह ध्यान रहता है कि किसी व्यक्ति पर हम अन्याय न करें। सरकार को तो लोग यह समझते हैं कि सरकार कोई चीज ही नहीं है। पहले समय में एक राजा होता था तो लोगों के चित्त में यह बात रहती थी कि यह राजा है और कोई अन्याय करे, टैक्स चुराये तो समझा जाता था कि उसने राजा का धन चुराया है, ऐसी दृष्टि लोगों की रहती थी। अब राजा किसे कहें? कमेटी है, वही सरकार है। यदि कमेटी के लोग भी ईमानदारी से चलते होते तो लोगों का उन पर विश्वास रहता, लेकिन सब लोग जानते हैं कि कमेटी के प्राय: सभी लोगों का आचरण यों ही खराब है तो जनता पर उसका विश्वास नहीं बनता। ऐसी परिस्थिति में भी श्रावकों का ऐसा कर्तव्य है कि वे अपनी ऐसी सीमा रक्खे कि जिससे दूसरे व्यक्ति का चित्त दु:खी न हो, और राज्यनियमों के उद्देश्यों का उल्लंघन न हो, किसी का धन अन्याय से न लें।


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