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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 572

From जैनकोष



गुणा गौणत्वमायांति यांति विद्या विडंबनां।

चौर्येणाकीर्तय: पुंसां शिरस्यादधते पदम्।।

चौर्यवृत्ति में गुणों का विघात- चोरी करने वाले में अन्य चाहे अनेक गुण हों लेकिन वे सब गुण गौण हो जाते हैं, नष्ट हो जाते हैं। अभी किसी के संबंध में मालूम तो पड़ जाय कि इसने चोरी की और अपनी मित्रमंडली गोष्ठी में भी जो अपने संग में रहता है तो सभी लोगों को उसके प्रति उपेक्षाभाव हो जाता है। चोरी करने वाले के सभी गुण गौणता को प्राप्त हो जाते हैं। विद्या कितनी ही पढ़े हो और चोरी करता हो तो उसकी विद्या विडंबनारूप हो जाती है। उस ज्ञान का कुछ महत्त्व नहीं रहता। जैसे आजकल लोग जरा-जरासी बात पर कहने लगते कि ये तो पक्के पुराने पंडित हैं। कोई गलती हो जाय तो उसके एवज में लोग कहते हैं। तो उसकी विडंबना ही तो बनी है। लोगों ने अहाना बना रक्खा है कि पर-उपदेश बहुतेरे। जो खुद तो कुछ न करे और दूसरों को शिक्षा दे उसका नाम पंडित है। प्राय: यह बात होती है। पंडिताई में, भाषण में जो कुछ सही सही बात है वह तो बोलनी ही पड़ती है और खुद कुछ करते नहीं हैं तो लोग पंडित कहने लगते हैं उसे जो दूसरों का उपदेश दे और खुद कुछ न करे। तो उसका अर्थ यही है कि जिसमें कोई प्रकार का ऐब है उसके सारे गुण भी गौण बन जाते हैं। वैसे ज्ञान दूसरी बात है, चारित्र दूसरी बात है, जो ज्ञान करे उसके चारित्र जगे ही जगे ऐसा कुछ नियम तो नहीं है। लेकिन चारित्र न जगे तो उस ज्ञान की शोभा नहीं है, वह ज्ञान विडंबनारूप है। अतएव कहा भी है कि वह ज्ञान काहे का जो ज्ञान कर ले और करे कुछ नहीं। वह ज्ञान तो भाररूप बन जाता है। जान करके भी सदाचार पर न चले तो उसके ज्ञानादिक गुण भी विडंबना को प्राप्त होते हैं। उनकी कुछ इज्जत नहीं रहती।

चोरी के क्लेश- चोरी करने वाले का बड़ा अपयश रहता है। जो लोग चोरी करते हैं, डाका डालते हैं उनका जीवन देख लो कभी सुख से रह ही नहीं सकता। डाका डाला, हजारों का धन लूटा मगर छिपकर रहना पड़ता है, जंगल में रहना पड़ता है। कभी-कभी खाने का भी साधन नहीं मिलता। तो चोरी करने वाले न तो सुखी रहते हैं और न धनी बनते हैं। बल्कि उनका अपयश ही फैलता है। चोरी करने वाले पुरुष के कोई गुण नहीं गाता है। उसका शास्त्र पढ़ना और विद्याएँ सीखना ये सब विडंबनारूप बन जाते हैं और अकीर्तिका टीका उनके ललाट पर लग जाता है। जो अस्तेयव्रत नहीं पाल सकते उनमें आत्मध्यान की पात्रता नहीं होती।


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