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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 574

From जैनकोष



परद्रव्यग्रहार्त्तस्य तस्करस्येह निर्दया।

गुरुबंधुसुतांहंतुं प्राय: प्रज्ञा प्रवर्त्तते।।

तस्करों की निर्दया प्रकृति- दूसरे के द्रव्य को ग्रहण करना एक ग्रह है, पिशाच है, उससे पीड़ित जो चोर है उसको तो गुरु, भाई, पुत्र जिस किसी को भी मार डालने की इच्छा हो जाती है। जो दूसरे के द्रव्य को ग्रहण करने का मन में परिणाम रखता है वह दूसरे को मार डालने का भी प्रयत्न कर सकता है और डाकू चोर तो ऐसा किया ही करते हैं। तो चोरी में कितनी कलुषता पड़ी हुई है इसका अंदाज कीजिए। चोरी की प्रकृति वाले पुरुष अनेकों की जान भी नष्ट कर सकते हैं। चोरों को दया नहीं रहती। चोरी साक्षात् हिंसा है। दूसरे का धन वैभव लोक में उसके प्राण की तरह है। जो अपने चित्त में शांति के विरुद्ध विकारभाव लायगा वह सुखी हो ही नहीं सकता। रूखा-सूखा जैसा मिले खा ले, पर दूसरों के द्रव्य को हड़पने का भाव न रखे। क्योंकि उस आदत में इसका नुकसान ही नुकसान है, आध्यात्मिक हानि है, कर्मबंध है और भविष्य में भी उसे चैन नहीं है। जो चोरी करते हैं वे पुरुष निर्दयी होते हैं, उनके दया का अंश नहीं जगता। प्रथम तो उन्होंने अपने आप पर निर्दयता की, अपने आपको शांत नहीं रख सके, शुद्ध ज्ञानप्रकाश में अपने को न रख सके, महान विकल्पों का अंधकार अपने आप पर चढ़ा लिया। चोरी में सब विवेक खतम हो जाते हैं। उसने अपनी तो हिंसा की ही, साथ ही उसमें दूसरों की भी हिंसा बसी हुई है।

पापनिवृत्ति का विवेक- वाल्मीक ऋषि का एक कथानक है कि पहले वे जंगल में रहते थे। मार्ग से कोई निकलता तो उसका धन छीन लेते थे। एक बार उसी मार्ग से एक साधुजी निकले तो उस साधु से भी वाल्मीक ने कहा, खड़े रहो, तुम्हारे पास जो कुछ हो वह रख जावो। तो कमंडल सोंटा जो भी था रख दिया और साधु बोला कि ये सब चीजें रखी हैं घर ले जावो और एक बात तुम घर से अपने कुटुंबियों से पूछकर आना। ...क्या? ...यह पूछकर आना कि तुम लोगों के पालन-पोषण के लिए हम इतना तो अन्याय करते हैं, दूसरों का धन हरते हैं, जान लेते हैं तो उससे जो पाप बँधेगा उसमें तुम सब भी आधा बाँट लोगे?...अच्छी बात पूछ कर आयेंगे। वाल्मीक तुरंत अपने घर आये, अपने माँ, बाप, स्त्री सबसे पूछा कि जो पाप हम तुम्हारे लिए करते हैं उनमें आधे बाँट लोगे ना?तो किसी ने पाप बाँटने के लिए स्वीकार भी नहीं किया। सबने मना कर दिया। तब वाल्मीक को ज्ञान जगा- ओह ! जिनके लिए हम अनर्थ कर रहे हैं वे कोई भी पाप के भागी नहीं बन रहे हैं, अब तो वास्तविकता इसी में है कि पर का विकल्प न बनाएँ। ये सभी भिन्न-भिन्न पदार्थ हैं, अन्य-अन्य जीव हैं। तो जहाँ निर्दोष वृत्ति जगती है वहाँ विवेक जगता है और चोरी जैसा खोटा परिणाम वहाँ हो नहीं सकता। जो चोरी का परिणाम रखता है उसको किसी के मारने में भी दया नहीं होती।


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