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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 583

From जैनकोष



विशंति नरकं घोरं दु:खज्वालाकरालितं।

अमुत्र नियतं मूढा: प्राणिनश्चौर्यचर्विता:।।

परधनाभिलाषा से आत्मपतन- यह अचौर्यमहाव्रत का प्रकरण चल रहा है। ध्यान के अंगों में 5 महाव्रतों का क्रम से वर्णन हो रहा है, उसमें यह अचौर्यव्रत का प्रकरण है। चोरी करने वाला मूढ़ पुरुष नियम से घोर दु:ख वाले नरक में प्रवेश करता है। परधन को हरने के जो अभिलाषी हैं या अन्याय करके, दगा देकर किसी भी प्रकार से जो पर की चीज को ग्रहण करने के अभिलाषी हैं उनके ये बातें उन्हें आत्मध्यान से पतित करने वाली हैं। इसको हम यों ही अनुभव कर लें कि हमारा उपयोग किसी परपदार्थ की ओर अन्याय से उसे ग्रहण करने की ओर चले तो हम अपने धर्म से कितना अधिक गिर गए। इसीलिए श्रावकों को सबसे पहली बात यही कही है कि वे न्याय से धन कमावें कदाचित् किसी परिस्थितिवश कुछ विवश होकर न्याय से गिरना पड़े तो भी यह ध्यान तो रखना ही चाहिए कि हम न्याय से गिर रहे हैं। इस ध्यान के रखने में वह अन्याय में उतर नहीं सकता। और, कभी ऐसी भी स्थिति बन सकेगी कि वह अपने जीवन में न्याय से कभी चूक न सकेगा। तो प्रत्येक व्यवहार में हमें न्यायप्रिय जरूर होना चाहिए। जिसे न्याय प्रिय नहीं है, अपनी स्वार्थवासना से अपने विषयपोषण के लिए अपने कषाय की पूर्ति के लिए यत्न करे, दूसरों के प्रति कुछ भी न सोचे और अन्याय का भी प्रयोग करे तो भला बतलावो कि इस विधि में उसने आत्मा का कौनसा लाभ लूट लिया।

न्यायप्रिय मानव में कल्याण की पात्रता- ये जगत के सब पदार्थ विनश्वर हैं और ये अन्याय से नहीं मिलते, पूर्वकृत पुण्यकर्म का जो उदय है उसके उदय में प्राप्त होते हैं। जो मिलने को है सो मिलता है, अन्याय करके तो और उस पुण्य में कमी कर ली जाती है। जो विशेष मिलना था उससे यह कम रह गया। न्याय से रहने में कदाचित् पूर्व पाप के उदय में हमें वैभव में सफलता भी नहीं मिलती तो भी आत्मसंतोष तो उसके होता ही है और निकट काल में ही उसके दु:ख के दिन भी खतम हो जाते हैं। मनुष्य को न्यायप्रिय होना चाहिए। न्याय प्रियता की जो प्रसन्नता हमारे आपमें है वह इतनी उत्कृष्ट प्रसन्नता है कि इसके प्रसाद से प्रभु के दर्शन प्रसन्न हृदय वाला भी वही पुरुष हो सकता है जिन्हें इस तत्त्व का बोध होता है। उस पर चलने वाले उससे लाभ लेते हैं। केवल एक ज्ञान कर लेने मात्र से वह आनंद नहीं जगता। उस पंथ पर अपना साहस बनाकर विपत्तियों को झेलकर चलने वाले पुरुष उसका लाभ लूटते हैं। जैसे किसी वस्तु का ज्ञान कर लेने पर केवल एक जानकारी बना लेने पर उसका स्वाद नहीं आ जाता है, उसके खाने पर स्वाद का अनुभव होता है। जानकारी भले ही हो जाय पर अनुभूति उसमें लगने से होती है, इसी प्रकार यह दृढ़ निर्णय कर लें कि इस मनुष्य का भला न्याय से ही है- अन्याय से नहीं है। अन्याय करने वाले का चित्त अंतरंग में दुखित रहता है और वह अपने आपको तो समझ ही रहा है कि मैंने अन्याय किया है। कदाचित् कोई दूसरा पुरुष न भी जान सके उसके मायाचार को, उसकी अन्यायवृत्ति को, लेकिन यह खुद आत्मा भगवान जिसने अन्याय किया है वह तो समझता है कि मैंने यह अन्याय किया है। उसके प्रसन्नता का प्रसाद रोज नहीं चमक सकता है। तो अपने जीवन में इस बात को समझें कि हमें न्यायप्रिय ही होना चाहिए।

न्यायप्रियता से धर्म की प्रभावना- धर्म की प्रभावना भी न्यायप्रियता के कारण हो सकती है। जो धर्म जीवों का भला कर सकता है उस धर्म की प्रभावना भी उस पुरुष ने की समझिये जो न्यायप्रिय होता है। जो न्यायप्रिय होता है उसकी जनता भी प्रशंसा करती है और जनता कहती है कि यह उत्कृष्ट धर्म को मानने वाला है। न्यायप्रिय मनुष्य प्रभावना अंग का पालन करने वाला है। सम्यग्दर्शन के अंग में अष्टम अंग है प्रभावना का अंग। प्रभावना कैसे बनती है, प्रभावना के लिए क्या करना चाहिए?

इसके लिए दो प्रकार से वर्णन किया है। स्वामी समंतभद्राचार्य ने तो बताया है कि जनता को अज्ञानरूपी अंधकार से हटाकर फिर यथायोग्य जैनशासन का माहात्म्य फैलाना इसका नाम प्रभावना है। जैसे किसी धार्मिक समारोह में हजारों रुपया खर्च किया, बहुत सा समय भी लगाया पर लोगों के पल्ले कुछ नहीं पड़ा तो वह प्रभावना नहीं कही जा सकती। हमारे हित का मार्ग क्या है, धर्म का स्वरूप क्या है यह बात पल्ले पड़े तो वह प्रभावना मानी जाय, नहीं तो उसे एक दिलबहलावा का काम समझिये। अमृतचंद्रसूरि ने तो सर्वार्थ सिद्धि में कहा है कि आत्मा का प्रभाव बढ़ना चाहिए रत्नत्रय के तेज से, इसी का नाम प्रभावना अंग है, अर्थात् अपना ऐसा शुद्ध ज्ञान और आचरण रखें कि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र का हममें विकास बने, इससे अपने आत्मा का भी प्रभाव बढ़ता है और लोक में भी प्रभावना अंग पलता है। तो आनंद तो धर्मप्रभावना में है।

अनात्मभाव की उपेक्षा से अचौर्यव्रत की उपासना- जो पुरुष अपने आत्मा को ही यह मैं हूँ और आत्मस्वरूप को ही यह मेरा स्वरूप है, यही मेरा वैभव है ऐसा मानकर परवस्तुवों से उपेक्षा भाव करता है, पर को पर समझ लेता है वह तो अचौर्यव्रत का एक महान उपासक है, और व्यवहार में पराये वैभव को पर जानकर उसको ग्रहण करने का भाव न रखे और उसे लेने के लिए अन्याय की भी कोई कल्पना न करे वह भी लोक में महिनीय पुरुष है, इसके विरुद्ध जो चोरी की प्रकृति वाले लोग हैं वे इस लोक में भी दु:खज्वाला से पीड़ित होते हैं और परभव में भी नरकादिक गतियों में वे दु:ख भोगा करते हैं।


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