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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 588

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विषयविरतिमूलं संयमोद्दामशाखम्यमदलशमपुष्पं ज्ञानलीलाफलाढयम्।

विबुधजनशकुंतै: सेवितं धर्मवृक्षंदहति मुनिरपीह स्तेयतीव्रानलेन।।

धर्मवृक्ष की व्रतमूलता- जिस धर्मरूपी वृक्ष को मुनियों ने बड़ी भक्तिभाव से संचित किया है, बढ़ाया है वह धर्मवृक्ष परधन में जरा भी चित्त जाने से जल जाया करता है। धर्मवृक्ष कैसा है? जिसका मूल तो विषयविरक्ति है अर्थात् व्रत है। पाँचों पापों का त्याग करना यह है धर्म की जड़। जड़ उसे कहें कि जिसके पोषण से सारा वृक्ष हरा भरा रहता है। तो पापों के त्याग से ही धर्म हरा भरा रहता है। धर्म नाम और किसका है? जो छोड़ने के पाप हैं उनका छोड़ना यही धर्म का मूल से पालन है। तो धर्मरूपी वृक्ष की जड़ है व्रत भाव।

धर्मवृक्ष की संयम शाखायें- इस वृक्ष की शाखा क्या है संयम की बड़ी-बड़ी शाखायें, नाना प्रकार के संयम इंद्रियसंयम। वे भी 6 प्रकार के संयम हैं। स्पर्शन इंद्रिय के वश में न होना, अंदर में कामभोग की ज्वाला जले तो उसके वश में न होना, यह है स्पर्शनइंद्रिय का संयम। चटपट रसीले स्वादिष्ट भोजन की आशा न रखना, उसकी तृष्णा प्रवृत्ति न करना सो है रसनाइंद्रिय का संयम, और, घ्राणेंद्रिय के विषय से विरक्त रहना यह है घ्राणेंद्रिय का संयम और नेत्र इंद्रिय के विषय हैं रूप आदिक देखना। उन रूप आदिक के निरीक्षण में आसक्त न होना सो है नेत्र इंद्रिय का संयम। इंद्रिय के विषय हैं सुंदर संगीत, रागभरे शब्द उनके श्रवण में राग न करना सो कर्णइंद्रिय का संयम है। जगत में अपने नाम और यश की चाह बनाना, मेरी कीर्ति हो यह है मन का विषय, मेरा नाम अनेकों वर्ष चले, इस प्रकार का परिणाम न होना यह है मन का संयम। तो इस धर्मरूपी वृक्ष में संयम की ऐसी बड़ी-बड़ी शाखायें निकलती हैं, एक होता है प्राणसंयम। एकेंद्रिय आदिक समस्त जीवों के प्राण की रक्षा करना यह है प्राण संयम। तो धर्मवृक्ष में ऐसे संयम की बड़ी-बड़ी शाखायें हैं।

धर्मवृक्ष के पत्र, पुष्प व फल- संयमवृक्ष में नियम आदिक के पत्र हैं। छोटे संयम बड़े संयम। मूल गुणरूप उत्तरगुणरूप नियमों का पालन ये हैं धर्मवृक्ष के पत्ते और वृक्ष में फूल होते हैं समता शांति के फूल, और ज्ञानलीला के फलों से भरा हुआ यह वृक्ष है। आखिर ऐसे धर्मवृक्ष से फल क्या मिलते हैं, ज्ञान की शुद्ध लीला। शुद्ध ज्ञान की सहज लीला में आनंद ही आनंद बसा है, धर्म का फल है शुद्ध आत्मीय आनंद। उन आत्मीय आनंद के फलों से यह धर्मवृक्ष हरा भरा है, और वृक्ष पर पक्षीगण बैठते हैं, वे पक्षी भी बड़े शोभनीय होते हैं। ऐसे ही पंडित, विद्वान, बुद्धिमान, विवेकी आत्मावों के द्वारा यह धर्मवृक्ष शोभित है।

अस्तेय के रंच परिणाम से भी धर्मवृक्ष का विनाश- ऐसे धर्मरूपी वृक्ष को चौर्य के रंच परिणाम से भी जला दिया जाता है, अन्य साधारण की तो बात क्या, बड़े-बड़े संत पुरुष भी एक चोरी का परिणाम आये तो उससे यह धर्मवृक्ष समाप्त हो जाता है। कितना सरल रहना चाहिए धर्मपालन के लिए उसकी झाँकी इस पद्य में दी गई है। जगत के जीवों से कुछ भी आशा न रखें और अपने जीवन में केवल धर्मपालन की मुख्यता मानें तो इस वृत्ति से सरलता प्रकट होती है। सरल पुरुष ही धर्मधारण करके मोक्षमार्ग में चलता है और वह निर्वाण को प्राप्त कर सकता हैं।


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