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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 600

From जैनकोष



सिक्तोऽप्यंबुधरव्रातै: प्लावितोऽप्यंबुराशिभि:।

न हि त्यजति संतापं कामवह्निप्रदीपित:।।

आत्मा की महनीयता का उपाय ब्रह्मचर्य- काम के प्रकोप से उत्पन्न हुए विकार को जीतने के लिए ऐसा ज्ञानाभ्यास, ऐसा उपयोग बने जिससे कामविषयक दोष और संसर्ग न हो अर्थात् स्त्रीजनों से विरक्ति रहे, ऐसे कामवाण से विरक्ति रहे और एक ब्रह्मत्व की उपासना के लिए रुचि जगह। देखिये जिन संतों ने, जिन महात्मावों ने जो भी महनीयता पायी है सभी महात्मावों की महनीयता का मूल कारण एक ब्रह्मचर्य व्रत मिलेगा। ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का विवेक न हो तो फिर मनुष्य को मनुष्य क्या कहा जाय? मनुष्य तो उसका ही नाम है जिसका मन श्रेष्ठ हो, जो हित और अहित का विवेक कर सके। फिर तो समझना चाहिए कुछ भी पालन करे, एक ब्रह्मचर्य की ओर दृष्टि नहीं है, इसके विरुद्ध खोटी प्रवृत्तियाँ चल रही हैं तो वे सब व्यर्थ हो जाती हैं।

शुद्धात्मा से ही आत्मा का हित- यह ग्रंथ है ध्यान का। जीवों को शरण एक आत्मा के शुद्धस्वरूप का ध्यान है। खूब बुद्धि का विस्तार करके परख लीजिए, कौनसा समागम इस जीव को शरण है। बाह्य समागमों में यदि समागम मिल गए तो तृष्णा का तो अंत है नहीं। और तृष्णा से व्याकुलता ही होती है। जो मिला उससे अधिक और मिलना चाहिए। हजार हुए तो लाख, लाख हुए तो करोड, इस तरह की दृष्टि बढ़ती ही जाती है। तो क्या उससे शांति मिली? उससे तो एक तृष्णा जगी, और दु:ख में विशेष पड़ गए। और समागम न मिले तो उसकी तरस रहती है, हम दीन हैं, दरिद्र हैं। इस प्रकार की चित्त में भावना रहती है। तो समागम मिले या न मिले, कितनी ही स्थितियाँ ऐसी होती हैं कि वहाँ शांति नहीं मिलती। यहाँ कोई भी समागम ऐसा नहीं है जो जीव को शरणभूत हो, सुखदायी हो। खूब निगाह डालकर सोच लीजिए। न स्त्री, न पुत्र, न नेतागिरी। ये सब स्वप्नवत् असार हैं। जब आत्मा को अपने स्वरूप का परिचय हो और समस्त सांसारिक समागमों से अपने चित्त को निवृत्त कर ले, अपने आपकी ओर अपना चित्त लगाये, आत्मध्यान करें तो इस उपयोग में उसे शांति प्राप्त हो सकती है।

यथार्थ विश्राम के उद्यम की श्रेष्ठता- भैया ! उद्यम ऐसा ही करना चाहिए जिससे कि आत्मा को यथार्थ विश्राम मिले। केवल एक गृहस्थी के नाते घर को ही बढ़ाना, घर से ही सुख समझना और पंचेंद्रिय के विषयों में ही अपना मन लगाना, उसके ही साधन जुटाना, उसकी तरक्की में ही मेरी तरक्की है ऐसा समझना, ये सब बातें इस जीव को कहाँ तक साथ दे सकेगी? आखिर जीव का संबंध तो जीव के खुद से है। वहाँ कोई ऐसा विचित्र फेर बने, परिवर्तन बने, जो एक अलौकिक और विलक्षण है वह तो लाभ की चीज है अन्यथा जैसे अनादिकाल से रुलते चले आये, वैसे ही रुलते रहे तो मनुष्यभव पाकर भी तत्त्व की बात कुछ न पायी। सच बात तो यह है कि वैभव में जब तक मोह बुद्धि रहती है तब तक यह संसार ही बढ़ता है और जहाँ मोहभाव हटा, ममता दूर हुई, भले ही व्यवस्था करते रहें किंतु एक सत्यप्रकाश रहे कि मेरा जगत में कुछ नहीं है। मेरा मात्र मैं ही हूँ। देह से भी न्यारा केवल ज्ञानस्वरूप मैं हूँ, ऐसी चित्त में यथार्थ प्रतीति हो तो इस प्रतीति के कारण इसे निर्भयता, नि:शंकता, निराकुलता, शांतिपथ, ये सब प्राप्त होंगे।

कल्याण की अप्रतीघातता- कल्याण का उद्यम गुप्त रहकर भीतर ही भीतर करना है, इसे रोकने वाला कोई नहीं है। बाहर का काम हो तो कोई उसका रोकने वाला भी बने। स्त्री, पुत्रादिक कोई भी न मानें, कहें कि यह काम मत करों। बाहर के कामों में कोई अधिक से अधिक इतना ही तो कर सकेगा कि तुम घर छोड़कर मत जावो, वन में मत रहो, त्यागी मत बनो। कदाचित् अपनी कमजोरी से या दूसरों के कहने से मान लो कोई अपने घर में ही रहता है, त्यागी बनकर जंगल में नहीं रहता है तो अपने उपयोग को अपने आत्मा की ओर लगाने में कोई बाधा डाल सकता है क्या? वह तो भीतर की बात है। वह तो स्वतंत्रता की बात है। ऐसी ज्ञानदृष्टि इन 24 घंटों में कभी भी 10-5 मिनट बने, तो अपने ज्ञानमात्र आत्मस्वरूप की ओर अपना झुकाव बनें तो उस आत्मस्वरूप के स्मरण के प्रताप से ऐसा शुद्ध वातावरण बनेगा कि उसका सारा दिन शांतिपूर्वक व्यतीत हो सकता है। हमारा कर्तव्य है कि हम पारमार्थिक ब्रह्मचर्य की साधना का उद्देश्य रखें और व्यवहारिक ब्रह्मचर्य की साधना को उस पारमार्थिक ब्रह्मचर्य के लाभ के लिए निर्दोष करते रहें।


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