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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 609

From जैनकोष



जंतुजातमिदं मन्ये स्मरवह्निप्रदीपितम्।

मज्जत्यगाधमध्यास्य पुरंध्रीकायकर्दमम्।।

कामादिक विषों की परयोगों से नि:प्रतीकारता- इस कामरूप विष को कालकूट विष से भी महान विष मानता हूँ क्योंकि कालकूट विष भी उपाय करने से मिट जाता है, किंतु कामरूपी विष उपायरहित है अर्थात् किसी पर के द्वारा इलाज करने से काम रोग दूर नहीं होता। यहाँ पूजन में द्रव्य चढ़ाने का मंत्र बोलते हैं तो कहते हैं कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं। कामवाण के विध्वंस के लिए मैं पुष्पों को चढ़ाता हूँ। उस चढ़ाने का अर्थ क्या? अभी तक यह समझता रहा कि ये पुष्प व और और भी दिलचस्प साधन ये मेरी काम की वेदना को मेटेंगे और इसीलिए इन साधनों को जुटाते रहे लेकिन उससे मिटे तो नहीं। तो अब हे नाथ ! मैं इन साधनों का परित्याग करता हूँ। जैसे अन्य मंत्रों में कहते हैं, जन्म, जरा, मृत्यु के विनाश के लिए मैं जल का निर्वपन करता हूँ। हे नाथ ! मैं अभी तक यह जानता रहा कि मैल को धोने के लिए जल समर्थ है। इस मुझमें ये तीन मैल लगे हैं, जन्म, जरा और मरण। तो मैंने सोचा कि इस जल के प्रयोग से मैं इन मलों को धो डालूँगा, लेकिन कितना ही मलमल कर नहाया, ये मल धुले नहीं, तब यह समझ में आ रहा है कि जन्म, जरा, मरण जैसे कठिन रोगों को दूर करने में यह जल समर्थ नहीं है अतएव मैं इस जल की उपेक्षा करता हूँ, चढ़ाता हूँ, छोड़ता हूँ, संसारसंताप के नाश करने के लिए इस चंदन का निर्वपन करता हूँ। भूल से यह माना कि कोई संताप उत्पन्न हो तो चंदन घिसकर लगा लें संताप दूर हो जायगा लेकिन संसार का संताप ऐसा विलक्षण है कि किसी भी शीतल पदार्थ से यह संताप दूर नहीं होता।

भेदविज्ञान से ही संसारसंताप के शमन होने की शक्यता- कोई पुरुष तृष्णा के वशीभूत होकर बेचैन है उस पुरुष को यदि किसी बर्फखाने जैसे ठंडे घर में डाल दिया तो क्या उससे उसका क्लेश मिट जायेगा? उस ताप को दूर करने में समर्थ कोई भी शीतल पदार्थ नहीं है। इस संसारसंताप को दूर करने में यदि कुछ समर्थ है तो वह एक विवेक है, भेदविज्ञान है। कितने ही कष्ट आये हों, सबसे न्यारे अपने ज्ञानमात्र आत्मा को निरख लीजिए तो वे सब संकट एक साथ दूर हो जाते हैं। तो इन सब वेदनाओं का इलाज है विवेक। भेदविज्ञान से जब यह जान लिया कि मैं कामनाओं से रहित केवल ज्ञानानंदस्वरूप मात्र हूँ और इस ही स्वरूप में अपने उपयोग को लगा दिया जाय तो ये समस्त संसारसंकट दूर हो जायेंगे। इसी उपाय पर हमें चलना चाहिए जिससे यह नरजीवन सफल हो जाय।


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