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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 611

From जैनकोष



घृणास्पदमतिक्रूरं पापाढयं योगिदूषितम्।

जनोऽयं कुरुते कर्म स्मरशार्दूलचर्वित:।।

कामज्वरतृषा पीड़ित प्राणियों की विपन्नता- संसार के प्राणी कामज्वर की दाह से उत्पन्न हुई प्यास से पीड़ित होकर अत्यंत आपत्ति के समूह रूप और असार इस दुर्गम संसाररूप मरुस्थल में यत्र-तत्र घूमकर दु:ख सहन करते हैं। पुराणों में कथा पढ़ी होगी पांडव के समय की जब पांडव और द्रोपदी अज्ञातवास में थे उस समय इन्होंने किसी एक राजघराने में अज्ञान रहकर भिन्न-भिन्न कार्यों की नौकरी करनी स्वीकार कर ली। वहाँ कीचक नाम का एक योद्धा प्रधान था। उसने कामवश होकर द्रोपदी को कुछ अकबक कहना शुरू किया, तो यह चर्चा जब भीम को मालूम हुई तो दूसरे दिन भीम स्वयं एक साधारण स्त्री के रूप में वहाँ पर गए। जब कीचक आया तो उसकी खूब मुगदर आदि अनेक शस्त्रों से खबर ली। यह तो एक पुराण की कथा है लेकिन इस जगत में इस तरह से पीटे जाने वाले अनेक उदाहरण मिलते हैं। कामज्वर के वशीभूत हुआ यह प्राणी जैसे कोई ज्वर की दाह से उत्पन्न हुई प्यास से तो पीड़ित है और मरुस्थल में यत्र-तत्र प्यास बुझाने की आशा से भ्रमण करता है, इसी तरह से यह प्राणी है तो अन्य मानसिक कामव्यथा से पीड़ित, उससे उत्पन्न हुई है तृष्णा की वेदना, उसको मिटाने के लिए इस संसार में यत्र-तत्र भ्रमण करता है और जिन समागमों को यह अपनी शांति का कारण मानता है वे सब समागम इसकी तृष्णा और व्यथा को बढ़ाते हैं। जैसे मरुस्थल में प्यास मिटाने का क्या साधन है? बल्कि मरुस्थल का भ्रमण प्यास को ही बढ़ाता है, इसी तरह संसार के ये समागम आंतरिक वेदना को मिटाने में क्या समर्थ हैं, बल्कि इनके संयोग में इनकी आशा से पीड़ित होकर दु:ख ही होता है।


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