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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 627

From जैनकोष



कुर्वंति वनिताहेतोरचिंत्यमपि साहसम् ।नरा:कामहठात्कारविधुरीकृतमानसा:।।

कामवशता में आत्महनन- अज्ञानी मोहियों के समूह में अधिकर विवाद, झगड़े उठा करते हैं वे इस ब्रह्मचर्य के अभाव के कारण अधिकतर हुआ करते हैं। यह मनुष्य विषयों से आतुर होकर अपने मन:प्रिय साधन स्त्री आदिक की चाह करता है, उसकी प्राप्ति नहीं हुई तो कभी कभी वह इतने वेग में आ जाता है कि शस्त्र, अग्नि आदिक से अपने ही प्राणों का घात कर डालता है। कामव्यथा से पीड़ित पुरुष क्या अन्याय नहीं कर डालता? अपने आपके सम्हाल की बात चल रही है। अपने आत्मा की सम्हाल रखना है तो मूल में ब्रह्मचर्य की साधना के लिए यह भी गुण आना चाहिए कि पुरुष कर्तव्यशील कर्मठ बने, अकर्मठता न आ सके।

कर्तव्यशीलता से ब्रह्मचर्य की साधना- जो मनुष्य बेकार होते हैं, जिनको उन्नत काम का प्रसंग नहीं मिलता, बेकार रहते हैं उनके अनेक प्रकार के खोटे आशय बन जाते हैं। बेकारी से बढ़कर इस जीव का कोई शत्रु नहीं है। गृहस्थ भी एक धर्मात्मा पुरुष है। घर गृहस्थी हो तो क्या यहाँ धर्म की आराधना कुछ कम है? ज्ञानी साधु संतों की अपेक्षा भले ही कम हो, लेकिन समय पर आजीविका करना और साधु संतों का आदर करना, व्यवस्था करना, सत्संगति में रुचि रखना और अनेक ढंगों से परोपकार करना आदिक जो कर्तव्य निभाते हैं वे गृहस्थ भी धर्मात्मा पुरुष हैं। हाँ बेकारी यदि हो तो बेकारी में गृहस्थ भी पतित हो जाता और साधु भी पतित हो जाता है। गृहस्थ की बेकारी गृहस्थ के ढंग की है, साधु की बेकारी साधु के ढंग की है। जो साधु ज्ञानार्जन, तपश्चरण आदिक आवश्यक कार्यों में न लगे वह साधु भी बेकार है। बेकार पुरुष में खोटे भाव आ ही जाते हैं। अत: उद्यमशील जरूर रहना चाहिए। कभी कुछ काम न भी मिले, कदाचित् ऐसी भी स्थिति आ जाय तो दीन दु:खियों की सेवा करने का कार्य तो सदा मौजूद है, उसे कौन छुड़ा लेता है, उसे करें। किसी न किसी कर्तव्य में अवश्य बने रहे पुरुष, अन्यथा बेकार रहने में खोटे आशय बनेंगे और अनेक तरह के विषयकषाय उत्पन्न होंगे तो जो कर्मठ हैं, धर्म के रुचिया भी हैं ऐसे पुरुष ब्रह्मचर्य की साधना कर लेते हैं।


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