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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 636

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स्मरदहनसुतीव्रानंतसंतापविद्धं

भुवनमिति समस्तं वीक्ष्य योगिप्रवीरा:।

विगतविषयसंगा: प्रत्यहं संश्रयंतेप्रशमजलधितीरं संयमारामरम्यम्।।

कामाग्निदाह से बचने का संतों का यत्न- जैसे कोई पुरुष किसी वन के किनारे जलती आग को देखकर उससे बचकर सही रास्ते से चलकर नदी के तट पर पहुँच जाता है तो उसे अग्नि का भय भी नहीं रहता है, अगर आयगी अग्नि यहाँ तक तो इस नदी के जल में कूद जायेंगे। यों उसके वहाँ नि:शंकता रहती है, ऐसे ही इस संसार में इच्छा को अग्नि को निरखकर, काम अग्नि को निरखकर और उन इच्छावों के, कामव्यथावों के संतापों से पीड़ित जीवों को निरखकर जो विवेकी पुरुष हैं वे संयमरूपी जल से शोभायमान शांत समुद्र के तट का सहारा लेते हैं।

ज्ञानी गृहस्थ की अंतर्वृत्ति- जब एक गृहस्थावस्था है, घर में रहते हैं तो यद्यपि सब निभाना पड़ेगा, पालन-पोषण, दूसरों का ख्याल, व्यवस्था, आजीविका कार्य, पर सब कुछ निरखकर भी ज्ञानी गृहस्थ अपने आपको केवल ज्ञानस्वरूप सबसे निराला समझता रहता है। हूँ तो मैं इतना ही, पर करना यह सब पड़ता है। ऐसा ज्ञानी निरखता है, जब कि मोही पुरुष इस जगत के कार्यों में रुचि लगाकर आसक्त रहते हैं। बस इतना मात्र अंतर है, ज्ञानी और अज्ञानी मनुष्य में। वही काम ज्ञानी कर रहा है, वही काम अज्ञानी कर रहा है, लेकिन ज्ञानी तो उससे निर्लेप है और अज्ञानी उसमें आसक्त है। ज्ञानी तो जल में भिन्न कमल की नाई है। जैसे कमल जल में ही पैदा हुआ, जल से ही उसका जीवन है, बिना जल के जी नहीं सकता, इतने पर भी कमल जल से अलिप्त बहुत ऊँचे रहता है। और वही कमल किसी कारण से पानी में आ जाय तो वह सड़ जाता है। ऐसे ही यह ज्ञानी गृहस्थ है। यद्यपि वह घर में ही पैदा हुआ, घर से ही उसका पालन-पोषण है, घर के कार्यों को करता है फिर भी घर से वह अलिप्त रहता है। उसका उपयोग परमात्मतत्त्व में बसा रहता है। अगर घर के कामों में वह बस जाय तो वह सड़ जायेगा अर्थात् अज्ञानी हो जायेगा। संसार में रुलना पड़ेगा।

समीचीन दृष्टि- ज्ञानी गृहस्थ संयम भी नहीं धार सक रहा, किंतु उसके सम्यग्दर्शन है तो उसकी इंद्र तक भी पूजा करते हैं, इंद्र तक भी उसका आदर देते हैं। तो सबसे बड़ी विभूति है सम्यग्दर्शन के प्राप्त होने की। वह सम्यक्त्व भेदविज्ञान से प्रकट होता है। भेदविज्ञान वस्तु के स्वरूप के यथार्थ जानने से प्रकट होता है। प्रत्येक पदार्थ अपने-अपने स्वरूप में हैं। किसी का कोई नहीं है। प्रत्येक पदार्थ पुद्गल अणु अणु अपना अपना अस्तित्व रखते हैं। मेरे में जो कुछ सुधार बिगाड़ है वह मेरे परिणमन से है। किसी परपदार्थ से परिणमन से नहीं है। यों प्रत्येक पदार्थ स्वतंत्र-स्वतंत्र निहारने की जिसे दृष्टि बन जायगी बस वही क्षण सम्यग्दर्शन का है, इसी को ही सम्यक्त्व का अनुभव कहते हैं।

हितकारिणी दृष्टि- प्रत्येक पदार्थ स्वतंत्र-स्वतंत्र अपने स्वरूप की सत्ता में आ रहे हैं। इस तरह दृष्टि बनने का नाम है सम्यग्दर्शन। इसके प्रताप से वैराग्य प्रकट होता है, उपेक्षा प्रकट होती है, पर में अनासक्ति होती है, अपनी ओर रुचि होती है, और जिस समय यह जीव केवल हो जायगा, शरीर से भी रहित, कर्मों से भी रहित केवल ज्ञानानंद प्रकाशमात्र रह जायगा उसी का नाम सिद्ध भगवान है। वे अनंतकाल तक के लिए ऐसे ही आनंदमग्न रहेंगे। उन्हें आदर्श मानकर हम अपने में यह भाव भरे कि मुझे यह बनना है। यहाँ के धनिक, नेतागिरी आदिक के पद कुछ भी मूल्य नहीं रखते हैं। मैं तो इस शरीर से भी न्यारा, रागादिक भावों से भी न्यारा केवल ज्ञानप्रकाशमात्र अपने आपका अनुभव करूँ और जैसा मैं सहज हूँ वैसा ही मैं हो जाऊँ, बस यही स्थिति मुझे चाहिए अन्य कुछ न चाहिए। ऐसी रुचि जगे उस ही के मायने है ज्ञान का अभ्युदय। उस ज्ञान की भावना होनी चाहिए और उसके लिए अपने को अभी से ऐसा मनन करने लगें कि मैं सचमुच देह से भी जुदा हूँ और केवल ज्ञानस्वरूप हूँ। मेरे गुण मेरा वैभव हैं, मेरा परिणमन मेरी समृद्धि है, अन्य सब कुछ पर है, भिन्न है, मैं तो ज्ञानानंदस्वरूप हूँ ऐसा अनुभव करने का यत्न करना चाहिए।

परकल्याण का मूल ब्रह्मचर्य धर्म- ब्रह्मचर्य ही एकमात्र शरण तत्त्व है। ज्ञानस्वरूप आत्मा ज्ञानपरिणति द्वारा ज्ञानस्वरूप में ज्ञानरूप में अवस्थित हो जाय, इसमें आत्मा का सर्वकल्याण है यही परमब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य के धारण से शांति के सत्य मार्ग में गमन होता है। ब्रह्मचर्य ही योगिपूजित परम ब्रह्मधर्म है। ब्रह्मधर्म ही श्रेयोमार्ग में अनिवार्य और आंतरिक तपश्चरण है।

।।ज्ञानार्णव प्रवचन नवम भाग समाप्त।।


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